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सिकन्दराराऊ (हसायन) 26 अगस्त। कस्बा में आज को चांद की बारहवीं तारीख पर छब्बीस अगस्त को ईद मिलादुन्नबी का पर्व इस्लामिक धर्म के मुस्लिम समुदाय के अकीदतमंदों ने शान ओ सिद्दत के साथ अपनी परंपरा रीति-रिवाज के अनुसार मनाया गया।ईद मिलादुन्नबी के पर्व पर जुलूस निकाला गया।ईद मिलादुन्नबी के पर्व पर जूलूस में घोडा,ऊंट पर बच्चे सवार होकर निकल रहे थे।जूलूस में मुस्लिम समुदाय के लोग अपने अपने हाथों में तिरंगा व मुस्लिम समुदाय के प्रतीकात्मक झंडे लेकर निकल रहे थे।जुलूस में डी.जे.पर युवा वर्ग देखो मेरे नबी की शान,बच्चा बच्चा है कुर्बान के नारे लगाते हुए जाते दिखाई दिए।जुलूस कस्बा के मोहल्ला शीशगरान जामा मस्जिद से प्रारंभ होकर कस्बा के मोहल्ला दखल,कछियान कलां,मोहल्ला कुरैशियान,नूरी मस्जिद,चर्च बाजार,पुरदिलनगर मार्ग,पंडित दीनदयाल उपाध्याय अंडौली तिराहा से कस्बा के मुख्य बाजार,मोहल्ला अहीरान, कोतवाली नगला रति मार्ग से बापिस आकार सकुशल सम्पन्न हुआ। मुस्लिम समुदाय के अकीदतमंदों ने बताया कि ईद मिलादुन्नबी का पर्व हर साल इस्लामिक कैलेंडर के तीसरे महीने रबीउल अव्वल चांद की बारह तारीख को मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व पूरे भारत में छब्बीस अगस्त को मनाया जाएगा। इस्लाम धर्म की मान्यता के अनुसार पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का जन्म 12 रबीउल अव्वल सन् 570 ईसवी को सऊदी अरब के पवित्र शहरं मक्का में हुआ।कुरैश कबीले से ताल्लुक रखते थे।इनके वालिद का नाम हजरत अब्दुल्ला और वालिदा का नाम बीबी आमना था।इनके जन्म से पहले ही इनके वालिद का इंतेकाल हो गया था।आपकी परवरिश आपके दादा और चाचा ने की।मुसलमान आपको अल्लाह का आखिरी नबी मानते हैं।बचपन से ही अल्लाह की इबादत में लीन रहे।उनका कहना था कि अल्लाह एक है।ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा के बाद मुसलमानों में ईद मिलादुन्नबी का बहुत महत्व है,क्योंकि इस दिन पैगंबर-ए-इस्लाम इस दुनिया में तशरीफ लाए।आपके जन्म के समय अरब की धरती पर बहुत-सी सामाजिक बुराइयां फैली हुई थीं।ऐसे माहौल में पैगंबर-ए-इस्लाम ने इंसानियत की अलख जगाई।बेटियों का जन्म अशुभ माना जाता था। उनके जन्म लेते ही जमीन में जिंदा दफन कर दिया जाता था। महिलाओं व मजदूरों के साथ जुल्म-ज्यादती की जाती थी। लोग उन्हें खरीदते और बेचते थे। शराब, जुआ, सूद, लड़ाई-झगड़े आम थे।लोग छोटे-छोटे कबीलों के बीच बंटे थे।एक-दूसरे की जान के दुश्मन थे।उस वक्त पैगंबर-ए-इस्लाम ने इंसानों के साथ पशु-पक्षियों व महिलाओं के हक में आवाज बुलंद की।आपका कहना था कि सभी इंसान बराबर है। पड़ोसियों के साथ अच्छा सलूक करने और मेहमानों के आदर-सत्कार पर जोर दिया।जीवन में हमेशा सच बोलने और अमानत में खयानत न करने की सीख दी।आप पशु क्रूरता के भी खिलाफ थे।लोगों से पशु-पक्षियों के साथ अच्छा व्यवहार करने व महिलाओं की कद्र करने का हुक्म दिया। महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया।जुआ,शराब,सूद,जिना को हराम करार दिया। साम्यवाद की बात भी आपने सबसे पहले लोगों के सामने रखी।काले-गोरे, अमीर-गरीब का भेद खत्म किया।पेड़-पौधे लगाने को सवाब का काम बताया।ईद मिलादुन्नबी का पर्व प्रेम,अमन,शांति, भाईचारे और मानवता का प्रतीक है।इस दिन मुसलमान अपने घरों पर इस्लामिक झंडा लगाने के साथ खूबसूरत रोशनी से घरों, मस्जिदों,बाजारों व प्रतिष्ठानों को सजाते हैं। एशिया, यूरोप, अमेरिका,अफ्रीका के तमाम देशों में आपकी याद में जुलूस निकाले जाते हैं।एक-दूसरे को मिठाई बांटी जाती है।ईद मिलादुन्नबी हमें शिक्षा और प्रेरणा देता है कि हम सब मुसलमान पैगंबर-ए-इस्लाम के बताए हुए अखलाक (सदाचार) को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाएं। दीन-दुखियों के साथ जरूरतमंदों की खूब मदद करें। बेसहारों का सहारा, भूखों के लिए भोजन, प्यासों के लिए पानी, बीमारों के लिए दवा की व्यवस्था करें। छोटे से प्रेम और अपने से बड़ों का सम्मान करें। यही खिराज-ए-अकीदत पैगंबर-ए-इस्लाम के लिए होगी। अपने वतन से सच्ची मोहब्बत के साथ हम इस दिन को विश्व शांति दिवस के रूप में मनाएं।जुलूस में महेन्द्र सिँह सोलंकी, बनी सिंह बघेल, जाहिद अली फौजी, अबरार अली शाहिद अली, वाहिद अली, अमीर अली, जानिब हसन, इक़बाल अंकल, अनवर पैकार,मोरमुकुट कुशवाहा सहित सभी लोग मौजूद दिखाई दिए।

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