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हाथरस 15 जुलाई। जेटीआरआई लखनऊ के निर्देशानुसार एवं जनपद न्यायाधीश विनय कुमार की अध्यक्षता में जनपद न्यायालय के समस्त न्यायिक अधिकारियों के लिए सतत सीखने एवं विधिक ज्ञान के अद्यतन के उद्देश्य से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कक्ष में प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया गया। प्रशिक्षण के दौरान अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट दीपक नाथ सरस्वती ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act), 1881 की धारा 138 से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधानों एवं सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि एक ही व्यापारिक लेन-देन (Single Underlying Transaction) के लिए कई चेक जारी किए गए हों और वे सभी अनादरित (बाउंस) हो जाएं, तो प्रत्येक चेक के बाउंस होने पर अलग-अलग स्वतंत्र परिवाद (Separate Complaint) दायर किया जा सकता है। प्रशिक्षण में यह भी बताया गया कि यदि कोई व्यक्ति अपने बैंक खाते से किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में ऋण अथवा अन्य वैधानिक दायित्व के पूर्ण या आंशिक भुगतान के लिए चेक जारी करता है और वह चेक बैंक द्वारा इस कारण लौटाया जाता है कि खाते में पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं है अथवा बैंक से हुए समझौते के अनुसार निर्धारित सीमा से अधिक राशि का भुगतान अपेक्षित है, तो ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति धारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम के अंतर्गत अपराध का दोषी माना जा सकता है। प्रशिक्षण सत्र का उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों को नवीनतम न्यायिक दृष्टांतों एवं विधिक प्रावधानों से अवगत कराते हुए न्यायिक कार्यों में एकरूपता, दक्षता एवं विधिक गुणवत्ता को और अधिक सुदृढ़ बनाना रहा।

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