हाथरस में सजेगी मूर्खिस्तान की अदालत: काका हाथरसी की परंपरा को जीवित रखेगा 67वां महामूर्ख सम्मेलन
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हाथरस में सजेगी मूर्खिस्तान की अदालत: काका हाथरसी की परंपरा को जीवित रखेगा 67वां महामूर्ख सम्मेलन

March 31, 2026
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हाथरस 31 मार्च । हास्य और व्यंग्य के शिखर पुरुष पद्मश्री काका हाथरसी द्वारा विश्व में पहली बार शुरू किया गया अनूठा कार्यक्रम ‘मूर्खिस्तान का महामूर्ख सम्मेलन’ इस वर्ष भी अपनी पूरी भव्यता के साथ आयोजित होने जा रहा है। ब्रज कला केंद्र के तत्वावधान में यह अद्भुत कार्यक्रम बुधवार,

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विश्व हिंदी दिवस पर ब्रज कला केंद्र द्वारा विचार एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन
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विश्व हिंदी दिवस पर ब्रज कला केंद्र द्वारा विचार एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन

January 10, 2026
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हाथरस 10 जनवरी । साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ब्रज कला केंद्र, हाथरस शाखा द्वारा कार्यालय श्री राधा कृष्ण कृपा भवन, आगरा रोड पर विश्व हिंदी दिवस के पावन अवसर पर विचार एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के वरिष्ठ साथी पंडित अविनाश चंद्र पचौरी ने

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सुरजीत मान जलईया सिंह की नई रचना ” प्रधान ”
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सुरजीत मान जलईया सिंह की नई रचना ” प्रधान ”

April 14, 2021
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पीठ पीछे जानता है क्या क्या कहते लोग हैं? सामने आता नहीं है कोई भी रघुराज के। जीतकर आया प्रधानी रोब थानेदार का। रोज दुगना बढ़ रहा है कद भी अब किरदार का। छटपटाती है खजूरी बोलती कुछ भी नहीं जैसे पंजों में फंसी हो एक चिड़िया बाज़ के। सामने

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अवशेष मानवतावादी का गीत – फिर भी ईश्वर के होने का होता है अहसास

November 17, 2019
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ना तो कोई भी सबूत है ना गवाह है पास। फिर ईश्वर भी के होने का होता है अहसास।। तोड़ तोड़कर कण को हमने कण कण में तोड़ा। फिर कण के टूटे कण कण को आपस में जोड़ा।। तत्व तत्व में छिपे तत्व का सारा तत्व निकाला, धरती क्या अम्बर

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शिव कुमार ‘दीपक’ की बाल रचना

July 28, 2018
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झूला लेकर आया सावन । हरियाली ले वर्षा आयी । बच्चों ने ली मन अंगड़ाई ।। दादुर पपिहा नाचे मोर । काली कोयल करे कनकोर ।। धानी चूँदर ओढ़े धरती । रिमझिम रिमझिम बरसा बरसी । छुक – छुक बच्चे रेल चलाते । हँसते गाते खूब नहाते ।। नदिया पोखर

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अकबर सिंह अकेला की एक कविता –

July 27, 2018
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वर्षा झमझम हो रही, मौसम भी परवान। हवा निराली चल रही, पंछी गाउत गान।। दिन में अँधियारी झुकी, बिल्कुल रात समान। लुका छिपी बदरा करें, सूरज अंतर ध्यान।। सांय काल में लग रहा, कबहुं न बरसो नीर | धूप खिली राहत मिली, बदलो रुखहिं समीर || अकबर सिंह अकेला मानिकपुर,

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यशोधरा यादव ‘यशो’का एक नवगीत

July 15, 2018
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लेखनी कुछ गीत लिख दुःखित जन को प्रीति लिख . कामनाओं की लता जब पुष्प से सज्जित हुई यंत्रवत कर्मों से हटकर प्रीति प्रतिबिम्बत हुई छंद के स्वर्णिम सवेरों की नयी रणनीति लिख लेखनी………… सूखते संबंध की टहनी पर कलियां खिल उठें बैठे जो अनजान बन मन मीत बन मिल

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कु० राखी सिंह शब्दिता की गजल

July 3, 2018
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ग़ज़ल तुमको भी मुहब्बत है बता क्यूं नहीं देते । रस्मों को वफ़ाओं की निभा क्यूं नहीं देते ।। हंसकर के मुझे देते हैं वो दर्दे- जुदाई ; ज़ख्मों की मगर मुझको दवा क्यूं नहीं देते ।। आँखों में कहीं दर्द समन्दर सा है गहरा ; जी भर के मुझे

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शिव कुमार ‘दीपक’ की कुंडलियां

June 30, 2018
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पानी की महिमा बड़ी , पानी जग का सार । समझो वह बेकार है , जो ना पानीदार ।। जो ना पानीदार ,नदी,नल,सर, तरु,जलधर । करें नही सम्मान ,नाव ,नर ,शकुची ,नभचर। कहता ‘दीपक’ सत्य , बताते सुर ,नर ज्ञानी । पंच तत्व में एक ,मुख्य जीवन हित पानी ।-१

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‘आह का अनुवाद’ गीतकार – इन्द्रपाल सिंह “इन्द्र”

June 30, 2018
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——आह का अनुवाद—– अश्रु की गंगा नयन से पीर ने जब-जब उतारी, याद आती है तुम्हारी….याद आती है तुम्हारी…. मौन साधा है अधर ने पूर्ण है पर बात सारी, याद आती है तुम्हारी ….याद आती है तुम्हारी…. प्यार का संसार था वो कल्प मुझको याद है, सुर्ख अधरों की छुअन

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