मथुरा 02 सितंबर। केडी मेडिकल कॉलेज-हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेण्टर के छात्र-छात्राओं ने 41वें राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े के तरह बुधवार को नुक्कड़ नाटक, रंगोली और आकर्षक पोस्टरों के जरिए आम जनता को नेत्रदान के प्रति जागरूक किया। मेडिकल छात्र-छात्राओं ने लघु नुक्कड़ नाटक के माध्यम से समाज में नेत्रदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर किया और समझाया कि मरणोपरांत आंखें दान करने से किसी अंधे व्यक्ति की दुनिया रोशन हो सकती है।
नेत्रदान पखवाड़े में छात्र-छात्राओं ने आंखों के महत्व को दर्शाने वाली रंगोलियां, विभिन्न चित्र और स्लोगन वाले पोस्टरों से नेत्रदान का संदेश दिया। मेडिकल विद्यार्थियों ने नुक्कड नाटक में बताया कि मृत्यु के कुछ घंटों के भीतर नेत्रदान किया जा सकता है। छात्र-छात्राओं ने संदेश दिया कि नेत्रदान में केवल कॉर्निया (पारदर्शी परत) लिया जाता है, जिससे चेहरे की बनावट पर कोई असर नहीं पड़ता है। चश्मा पहनने वाले या मोतियाबिंद का ऑपरेशन करा चुके लोग भी नेत्रदान कर सकते हैं। के.डी. विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मनेष लाहौरी ने नेत्र विभाग तथा छात्र-छात्राओं की कल्पनाशीलता, रचनात्मक संदेशपरक रंगोलियों एवं पोस्टरों की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि आंखें मानव शरीर के सबसे महत्वपूर्ण संवेदी अंगों में से एक हैं, क्योंकि ये दृष्टि और देखने की शक्ति प्रदान करती हैं। नेत्रदान से हम किसी की जिन्दगी को रोशन कर सकते हैं। डॉ. लाहौरी ने कहा कि मृत्यु के बाद आंखें दान कर किसी दृष्टिहीन व्यक्ति के जीवन में हमेशा के लिए रोशनी लौटाई जा सकती है।
डॉ. लाहौरी ने कहा कि नेत्रदान पखवाड़ा आम गलतफहमियों को दूर करने का एक अवसर है। कई लोग नेत्रदान का समर्थन करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वे इसके लिए पात्र हैं या नहीं, मृत्यु के बाद उनके परिवार को क्या करना होगा या क्या नेत्रदान से पारम्परिक अंतिम संस्कार में कोई बाधा आती है। उन्होंने कहा कि नेत्रदान एक ऐसा सामाजिक कार्य है, जिससे किसी दृष्टिहीन व्यक्ति के जीवन में रोशनी लौटाई जा सकती है। नेत्र रोग विभागाध्यक्ष डॉ. शिप्रा त्रिपाठी ने सभी विभागाध्यक्षों का छात्र-छात्राओं का हौसला बढ़ाने के लिए धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि समाज में जागरूकता बढ़ने के बावजूद, बहुत से लोगों के मन में नेत्रदान को लेकर कई सवाल रहते हैं। कुछ लोग इस बात को लेकर अनिश्चित हैं कि उनकी उम्र या स्वास्थ्य संबंधी स्थिति उन्हें नेत्रदान करने की अनुमति देती है या नहीं, जबकि अन्य इस बात को लेकर चिंतित हैं कि नेत्रदान शरीर, अंतिम संस्कार की व्यवस्था या परिवार को कैसे प्रभावित करता है।
डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि नेत्रदान पखवाड़े का मुख्य संदेश लोगों को मरणोपरांत नेत्रदान के प्रति जागरूक करना, कॉर्निया (पुतली) अंधता को दूर करना और नेत्रदान से जुड़े अंधविश्वासों व भ्रांतियों को खत्म करना है। डॉ. शिप्रा त्रिपाठी ने बताया कि के.डी. हॉस्पिटल को आर्गन ट्रांस प्लांट का लाइसेंस मिल चुका है लिहाजा भविष्य में प्रत्येक बृजवासी को सभी प्रकार के कार्निया ट्रांसप्लांट की सुविधा यहां मिल सकेगी। अंत में उप-प्राचार्या डॉ. गगनदीप कौर, डॉ. वी.पी. पांडेय, डॉ. एस.के. बंसल, डॉ. प्रणीता जसवंत सिंह, उप-चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वरुण सिसोदिया, डॉ. सौरभ कुलकर्णी, डॉ. अमनजोत कौर चौहान, डॉ. आशुतोष कुमार सिंह, डॉ. मनीषा शर्मा आदि ने उपचार और परामर्श के लिए पहुंचे मरीजों एवं उनके तीमारदारों को नेत्रदान की प्रक्रिया और इसके महत्व की जानकारी दी तथा मरणोपरांत नेत्रदान के लिए संकल्प लेने की अपील की। अतिथियों ने छात्र-छात्राओं को प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर उनका उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम की सफलता में नेत्र विभाग की डॉ. अंजली चौधरी, डॉ. अनुपमा पांडेय, डॉ. शिल्पा गुप्ता, डॉ. मनु, डॉ. प्रज्जोत, डॉ. सुरभि, डॉ. प्रगति, डॉ. मेधा, डॉ. सोनी, डॉ. अक्षत, डॉ. विष्णु, डॉ. नोवोना, डॉ. इतिशा, अखिलेश शुक्ला आदि का विशेष योगदान रहा।













