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हाथरस 08 मई । सघन खेती और रसायनों के बढ़ते प्रयोग के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए ‘हरी खाद’ मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन का सबसे प्रभावी और वैज्ञानिक मार्ग है। चन्द्र शेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के प्रोफेसर डॉ. कौशल कुमार एवं कृषि विज्ञान केंद्र, हाथरस के वैज्ञानिक डॉ. बलवीर सिंह ने बताया कि सनई और ढैंचा जैसी दलहनी फसलें अपनी जड़ों की ग्रंथियों में मौजूद राइजोबियम द्वारा प्रति हेक्टेयर 60 से 150 किग्रा नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, जहाँ सनई मध्यम भूमि के लिए सर्वोत्तम है, वहीं ढैंचा अपनी सहनशीलता के कारण क्षारीय, सूखा और जलभराव वाली समस्याग्रस्त मिट्टियों के लिए ‘मृदा सुधारक’ के रूप में कार्य करता है। यह प्रक्रिया न केवल मिट्टी में ‘ह्यूमस’ बढ़ाकर सूक्ष्मजैविक सक्रियता को तेज करती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता को भी स्थायी रूप से पुनर्स्थापित करती है।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि हरी खाद केवल पोषक तत्वों की आपूर्ति ही नहीं करती, बल्कि यह मृदा के स्थूल घनत्व को कम कर उसकी संरचना और जल धारण क्षमता में भी वृद्धि करती है। जब इन फसलों को 40 से 50 दिनों के भीतर मिट्टी में पलट दिया जाता है, तो अपघटन के दौरान निकलने वाले कार्बनिक अम्ल मिट्टी में मौजूद अघुलनशील फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों को पौधों के लिए सुलभ बना देते हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर किसानों की निर्भरता 25-30% तक कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त, हरी खाद की घनी परत मृदा अपरदन को रोकने, खरपतवारों का दमन करने और ‘कार्बन पृथक्करण’ के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी सहायक है। सही फसल चयन और राइजोबियम कल्चर का वैज्ञानिक समन्वय इस तकनीक को और भी अधिक प्रभावी बना देता है।

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