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हाथरस 02 जुलाई। आज का भारतीय समाज एक ओर तकनीकी प्रगति, आर्थिक विकास और वैज्ञानिक उपलब्धियों के नए आयाम स्थापित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर मानवीय मूल्यों और नैतिकता के क्षेत्र में गंभीर संकट का सामना भी कर रहा है। प्रतिदिन भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, आत्महत्या, संवेदनहीनता, पारिवारिक विघटन तथा पति-पत्नी के बीच बढ़ते अविश्वास जैसी घटनाएं समाज को झकझोर रही हैं और भय तथा असुरक्षा का वातावरण निर्मित कर रही हैं।

विडंबना यह भी है कि ऐसी नकारात्मक घटनाएं समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया पर प्रमुखता से स्थान पाती हैं, जबकि सकारात्मक और नैतिक मूल्यों से प्रेरित समाचार अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि नैतिक पतन के लिए वास्तव में जिम्मेदार कौन है? क्या इसका उत्तर किसी एक व्यक्ति, संस्था या वर्ग में खोजा जा सकता है, या यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है?

एक सामाजिक विश्लेषक के रूप में मेरा मानना है कि इसके पीछे अनेक कारण हैं। सबसे पहले, आधुनिक समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमने “होने” से अधिक “दिखने” को महत्व देना शुरू कर दिया है। आज किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके चरित्र, ईमानदारी और ज्ञान से कम तथा उसकी संपत्ति, गाड़ी, बंगले और बैंक बैलेंस से अधिक किया जाता है। धन कमाने की अंधी दौड़ ने यह मानसिकता पैदा कर दी है कि यदि लक्ष्य प्राप्त हो जाए तो साधनों की पवित्रता का कोई महत्व नहीं रह जाता। यही सोच नैतिक पतन की सबसे बड़ी जड़ बनती जा रही है।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण संयुक्त परिवारों का विघटन है। कभी दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों के पहले शिक्षक हुआ करते थे। उनकी कहानियों और अनुभवों से त्याग, सहयोग, अनुशासन और सहानुभूति जैसे संस्कार सहज रूप से विकसित होते थे। आज एकल परिवारों के बढ़ते चलन और माता-पिता की व्यस्त जीवनशैली के कारण बच्चों को वह नैतिक वातावरण नहीं मिल पा रहा है। समय और स्नेह की कमी को महंगे संसाधनों से पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि संस्कारों का कोई विकल्प नहीं हो सकता।

शिक्षा व्यवस्था भी इस संकट का एक महत्वपूर्ण कारण है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य चरित्र निर्माण की अपेक्षा रोजगार और प्रतिस्पर्धा तक सीमित होता जा रहा है। विद्यालय और महाविद्यालय विद्यार्थियों को डिग्रियां तो दे रहे हैं, लेकिन उन्हें संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही। नैतिक शिक्षा या तो पाठ्यक्रम से लगभग समाप्त हो चुकी है या केवल औपचारिक विषय बनकर रह गई है। जब शिक्षा का लक्ष्य केवल आकर्षक वेतन और नौकरी प्राप्त करना रह जाएगा, तब समाज को उत्कृष्ट नागरिकों की बजाय केवल कुशल पेशेवर ही मिलेंगे। प्राचीन दार्शनिक अरस्तु ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज से कटकर न तो उसका पूर्ण विकास संभव है और न ही स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था का निर्माण।

धार्मिक और आध्यात्मिक नेतृत्व की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब धर्म का उद्देश्य आत्मिक उन्नति के बजाय प्रदर्शन, व्यवसाय या व्यक्तिगत प्रसिद्धि तक सीमित हो जाता है, तब समाज में नैतिक चेतना कमजोर पड़ने लगती है। धर्म तभी प्रभावी बनता है जब उसके उपदेशों के साथ उसका आचरण भी दिखाई दे।

इसी प्रकार किसी भी समाज के नैतिक मानदंड उसके आदर्श व्यक्तित्व तय करते हैं। राजनीति, व्यवसाय, मनोरंजन, खेल और अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों का आचरण समाज पर गहरा प्रभाव डालता है। यदि समाज यह देखता है कि नियमों की अवहेलना करने वाले और भ्रष्ट लोग सम्मान, शक्ति और सफलता प्राप्त कर रहे हैं, तो ईमानदारी और नैतिकता पर लोगों का विश्वास कमजोर पड़ना स्वाभाविक है।

स्पष्ट है कि नैतिकता के ह्रास के लिए किसी एक व्यक्ति, संस्था, धर्म या व्यवस्था को पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। समाज के रूप में हमने ईमानदार व्यक्ति को अक्सर “बेवकूफ” और छल-कपट करने वाले व्यक्ति को “सफल” मानना शुरू कर दिया है। माता-पिता के रूप में हम बच्चों से अच्छे अंक और सफल करियर की अपेक्षा तो रखते हैं, लेकिन उन्हें अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देने में कई बार पीछे रह जाते हैं। एक नागरिक के रूप में हम अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हैं, किंतु अपने कर्तव्यों के पालन में उतनी गंभीरता नहीं दिखाते।

इस संकट का समाधान भी हमारे ही हाथों में है। नैतिकता की पुनर्स्थापना का आरंभ व्यक्तिगत स्तर से होना चाहिए। जब तक सफलता का पैमाना केवल धन-संपत्ति नहीं, बल्कि चरित्र, सेवा-भाव, ईमानदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं बनेगा, तब तक यह संकट समाप्त नहीं होगा। शिक्षा में नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना, परिवारों में संवाद और संस्कारों को बढ़ावा, समाज में ईमानदारी का सम्मान तथा सोशल मीडिया के प्रति आत्म-अनुशासन—ये सभी कदम मिलकर एक स्वस्थ, संवेदनशील और नैतिक समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं से शुरुआत करे, तो नैतिकता का पुनर्जागरण केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि एक साकार होने वाली सामाजिक वास्तविकता बन सकता है।

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