
नई दिल्ली 03 अगस्त। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला के साथ क्रूरता के मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A लागू होगी या नहीं, इस महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने फरवरी 2026 में इस सवाल पर विचार करते हुए केंद्र सरकार को भी मामले में पक्षकार बनाया था। अदालत ने मामले की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। मामला यह है कि क्या किसी ऐसे पुरुष के खिलाफ, जो किसी महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप अथवा ‘शादी जैसे रिश्ते’ में रह रहा हो, महिला के साथ क्रूरता के आरोप में IPC की धारा 498A के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। यह सवाल कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, जिसमें हाईकोर्ट ने शादी जैसे लिव-इन रिश्ते में 498A के तहत कार्रवाई को पूरी तरह खारिज करने से इनकार किया था।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि धारा 498A में इस्तेमाल किए गए ‘पति’ शब्द की व्याख्या क्या ऐसे पुरुष तक की जा सकती है, जो महिला के साथ औपचारिक विवाह के बिना ऐसे रिश्ते में रह रहा हो, जिसे कानून की नजर में ‘रिलेशनशिप इन द नेचर ऑफ मैरिज’ माना जा सकता है। इसी कानूनी प्रश्न की व्यापकता को देखते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को पक्षकार बनाया और इस मामले में सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता नीना आर. नरीमन को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया। इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि 1 जुलाई 2024 से भारतीय दंड संहिता (IPC) की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू हो चुकी है। धारा 498A से संबंधित प्रावधान अब BNS की धारा 85 में है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित कानूनी सवाल में इसलिए पुराने IPC प्रावधान के साथ उसके संबंधित BNS प्रावधान का भी संदर्भ आया है। फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम रूप से यह फैसला सुना दिया है कि ‘शादी जैसे’ सभी लिव-इन रिश्तों पर 498A लागू होगी। उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड के अनुसार मामला अभी विचाराधीन है और शीर्ष अदालत का अंतिम फैसला आना बाकी है। इसलिए इस मामले में आगे होने वाली सुनवाई पर कानून के जानकारों और आम लोगों की नजर बनी हुई है।











