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हाथरस 28 अप्रैल । हाथरस जिले में शुद्ध पेयजल के नाम पर एक बड़ा गोरखधंधा फल-फूल रहा है, जो आम लोगों की सेहत के लिए घातक साबित हो सकता है। जिले में संचालित लगभग 120 आरओ प्लांटों में से मात्र 8 के पास ही वैध लाइसेंस हैं, जबकि बाकी 112 प्लांट चोरी-छिपे और बिना किसी मानक के धड़ल्ले से पानी की सप्लाई कर रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, हाथरस शहर में लाइसेंसी प्लांटों की कुल क्षमता प्रतिदिन अधिकतम 3,000 कैंपर की है, जबकि बाजार की मांग 8 से 10 हजार कैंपर की है। पूरे जिले में यह मांग 30 हजार कैंपर तक पहुंच जाती है, जिससे स्पष्ट है कि अवैध रूप से संचालित प्लांट बड़ी मात्रा में असुरक्षित पानी बेच रहे हैं। इन अवैध प्लांटों में न तो पानी की गुणवत्ता (बैक्टीरिया, नाइट्रेट्स, आर्सेनिक, टीडीएस) की जांच की जाती है और न ही समय पर फिल्टर व मैंब्रेन बदले जाते हैं।

चिकित्सकों के अनुसार, इस प्रकार का दूषित पानी डायरिया, टाइफाइड, हैजा और हेपेटाइटिस जैसी जलजनित बीमारियों का मुख्य कारण बन रहा है। पानी में नाइट्रेट की अधिकता पेट का कैंसर और किडनी फेलियर जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकती है, जबकि आर्सेनिक की मौजूदगी से मधुमेह और उच्च रक्तचाप का खतरा बढ़ जाता है। इन प्लांटों के अलावा, बाजार में नामी कंपनियों के नाम से मिलती-जुलती नकली बोतलें और खुलेआम बिकने वाले पानी के पाउच भी लोगों की सेहत बिगाड़ रहे हैं, जो तालाब चौराहा, बस स्टैंड और जिला अस्पताल जैसे इलाकों में धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं।

गौरतलब है कि बीआईएस (BIS) प्रमाणन, एफएसएसएआई (FSSAI) लाइसेंस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी के बिना पानी बेचना पूरी तरह गैर-कानूनी है। जल निगम के मानकों के अनुसार 50 से 150 टीडीएस स्तर का पानी पीने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है, लेकिन अवैध प्लांट संचालक इस मानक की अनदेखी कर रहे हैं। इस गंभीर स्थिति पर खाद्य सुरक्षा विभाग के सहायक आयुक्त रणधीर सिंह का कहना है कि विभाग समय-समय पर निरीक्षण करता है और जो भी प्लांट मानक पूरे नहीं करेगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जनस्वास्थ्य के साथ किसी भी स्तर पर खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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