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हाथरस 29 मई । आज के दौर में जहां बड़ी डिग्रियों और औपचारिक शिक्षा को ही बुद्धिमत्ता का पैमाना माना जाने लगा है, वहीं हाथरस के जागरूक नागरिक अनुरोध लाल ने समाज के सामने एक महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत करते हुए कहा है कि साक्षरता और समझदारी को एक ही तराजू में नहीं तौलना चाहिए। उन्होंने अपने लेख “साक्षरता बनाम समझदारी: एक जमीनी हकीकत” के माध्यम से यह संदेश दिया कि जीवन का वास्तविक ज्ञान केवल किताबों से नहीं, बल्कि अनुभव, व्यवहार और संघर्षों से भी प्राप्त होता है। उन्होंने अपने लेख में लिखा कि शिक्षा निश्चित रूप से समाज का आईना है और देश निर्माण में शिक्षित लोगों की भूमिका अतुलनीय रही है, लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि कई महान व्यक्तित्व ऐसे भी हुए जिन्होंने बिना पारंपरिक डिग्री के दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। लेख में संत कबीर दास, रवींद्रनाथ टैगोर, थॉमस अल्वा एडिसन, माइकल फैराडे, धीरुभाई अंबानी और स्टीव जॉब्स जैसे महान लोगों के उदाहरण देते हुए बताया गया कि डिग्री से अधिक महत्वपूर्ण इंसान की सोच, अनुभव और कर्म होते हैं। अनुरोध लाल ने कहा कि एक शिक्षित व्यक्ति सिद्धांतों की गहराई समझता है, वहीं एक अनुभवी व्यक्ति जीवन की वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से समझता है। किसान, कारीगर और बुजुर्गों का अनुभव भी समाज के लिए उतना ही मूल्यवान है जितना किसी डिग्रीधारी का ज्ञान। उन्होंने समाज से अपील करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसकी डिग्री से नहीं, बल्कि उसके संस्कार, व्यवहार, संवेदनशीलता और कर्मों से किया जाना चाहिए। समाज का विकास तभी संभव है जब शिक्षा और अनुभव दोनों को समान सम्मान मिले। लेख के अंत में उन्होंने भावुक संदेश देते हुए कहा कि “समाज का रथ दो पहियों से चलता है — एक अक्षर और दूसरा अनुभव। किसी के पास डिग्री न होना उसकी मजबूरी हो सकती है, लेकिन उसका हुनर, अनुभव और इंसानियत ही उसकी असली पहचान है।” यह लेख वर्तमान समाज को सोचने पर मजबूर करता है कि वास्तविक बुद्धिमत्ता केवल प्रमाणपत्रों में नहीं, बल्कि व्यक्ति के जीवन मूल्यों और व्यवहार में भी छिपी होती है।

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