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सिकन्दराराऊ (हसायन) 30 सितम्बर। कस्बा के मोहल्ला किला खेडा स्थिति प्राचीन बगीची श्री हनुमान जी महाराज के मंदिर परिसर में श्रीराम युवा क्लब के तत्वावधान में आयोजित श्रीरामलीला महोत्सव के तहत तीसरे दिन रात्रि में वृंदावन के श्रीराधांचल लीला संस्थान के कलाकारों के द्वारा श्रीरामलीला महोत्सव के श्रीरामलीला कार्यक्रम का मंचन का आयोजन किया।श्रीरामलीला महोत्सव के कार्यक्रम के तहत श्रीरामलीला महोत्सव कार्यक्रम कमेटी के पदाधिकारियो व श्रीराधांचल लीला संस्थान के संचालक दल के कार्यकर्ताओ के द्वारा भगवान श्रीराम जानकी की आरती उतारकर स्तुति आराधना कर तीसरे दिन की श्रीराम की लीला का मनोहारी भाव पूर्ण तरीके से मंचन कर कार्यक्रम प्रस्तुत किया।भगवान श्रीराम की किशोरावस्था में की गई लीला का मंचन किया गया। भगवान श्रीराम के द्वारा अयोध्या से विश्वामित्र के साथ जाने के उपरांत की गई विभिन्न लीला का मनोहारी मंचन होते देख श्रोता भाव विभोर हो गए।श्रीराधांचल लीला संस्थान के कलाकारों के द्वारा महर्षि विश्वामित्र के साथ वन में पहुंचकर ताडका सुबाहू मारीच  का वध कर यज्ञ रक्षा लीला का मंचन किए जाने के दौरान भगवान विश्वामित्र के साथ भगवान श्रीराम लक्ष्मण को लेकर जनकपुर के राजा जनक के द्वारा अपनी पुत्री जानकी सीता के द्वारा किए जा रहे सीता स्वंयवर में धनुष भंग लीला का मंचन किया।श्री जानकी जी सीता भगवान श्रीराम विवाह के दौरान रावण और राजा बलि के सुपुत्र राजा जनक के गुरूभाई वाणासुर के बीच हुए तीखे संवाद की लीला का मंचन किया गया।रावण और वाणासुर संवाद लीला के दौरान जनकपुर में राजा जनक के द्वारा सीता स्वंयवर के दौरान धनुष भंग लीला के दौरान धनुष भंग करने के लिए आए दूर दूर के राजाओ के द्वारा भगवान शिव के पिनाक धनुष को भंग करना तो दूर शिव धनुष को हिला तक नही पाए।यह देख राजा जनक के द्वारा सीता स्वंयवर लीला मंचन के दौरान जैसे ही कहा कि क्या पृथ्वी वीर क्षत्रिय विहीन हो गई।तो राजा जनक के वीर और क्षत्रिय विहीन पृथ्वी कहे जाने पर अयोध्या के राजा दशरथ के अनुज छोटे सुपुत्र शेषनाग के अवतार  विश्वामित्र के साथ मंच पर बैठकर आक्रोशित हो गए।राजा जनक के द्वारा कहे गए शब्दो को सुनकर लखनलाल के द्वारा सभा में ही तमाम ज्ञानवर्द्धक बाते कहते हुए तीखे संवाद लीला प्रस्तुत की।लखनलाल लक्ष्मण जी के तीखे आक्रोश भरे संवाद सुनकर राजा जनक समझ गए कि शायद अब धनुष भंग जल्द हो जाएगा।लखनलाल लक्ष्मण के द्वारा राजा जनक की सीता स्वंयवर कार्यक्रम सभा में व्यक्त किए गए क्रोध भरे संवाद के उपरांत भगवान श्रीराम ने गुरू महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान शिव के पिनाक धनुष को भंग कर धनुष पर जैसे ही प्रत्यंचा चढाई तो शिव धनुष के टूटते ही श्रीरामलीला महोत्सव पंडाल में सीता जी स्वंयवर हुआ।सीता स्वंयवर के दौरान जनक दुलारी जनक नंदनी जानकी जी माता सीता जी के द्वारा भगवान श्रीराम के स्वंयवर लीला के दौरान भगवान श्रीराम के वरमाला पहनाने के लिए जैसे ही भगवान श्रीराम के समीप पहुंची।तो माता जानकी भगवान श्रीराम से छोटी  होने के दौरान वरमाला नही पहना पाई।तो माता जानकी जी ने अपने देवर लक्ष्मण जी से आंखों ही आंखों में मन ही मन इशारा कर कहा कि तनिक पृथ्वी को अपने फर धारण कर हल्का ऊचा कर दो ताकि मैं वरमाला पहना दूं।माता जानकी के इतना कहते ही लक्ष्मण जी स्वंय भगवन श्रीराम के चरणों में जमीन पर लेट गए।जब भगवान श्रीराम ने देखा कि आज लक्ष्मण प्रणाम करने के बाद अभी तक क्यों जमीन पर लेटा हुआ है।भगवान सब लीला को समझ गए।जैसे ही भगवान श्रीराम लक्ष्मण जी को अपने चरणों से उठाने के लिए झुके तभी माता जानकी सीता जी ने जल्दी से भगवान श्रीराम के गले में वरमाला पहना दी।भगवान श्रीराम सीता का स्वंयवर होने के दौरान वातावरण भगवान श्रीराम जानकी के जयकारों से गूंजयमान हो गया।भगवान श्रीराम सीता स्वंयवर लीला के दौरान भगवान शिव के पिनाक धनुष टूटने की ध्वनि सुनकर भगवान परशुराम क्रोधित होकर जनकपुर पहुंच गए।जनकपुर में सीता स्वंयवर में पिनाक शिव धनुष भंग होने के बाद भगवान परशुराम व लक्ष्मण के बीच संवाद के बाद भगवान श्रीराम ने भगवान परशुराम के कहे अनुसार कुंभकर्ण के सुपुत्र की ओर धनुष पर प्रतंचा चढाकर परशुराम को स्वंय के भगवान होने का विश्वास कराया।तब भगवान परशुराम का भगवान श्रीराम को समझ पाए।

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