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हाथरस 14 जून । रुहेरी गांव में ‘खेत बचाओ अभियान’ के अंतर्गत किसान जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य विषय “मिट्टी बचाएं, भविष्य बचाएं : सतत कृषि के माध्यम से” रहा। इस अवसर पर किसानों को मृदा संरक्षण, सतत कृषि पद्धतियों, मृदा परीक्षण आधारित संतुलित पोषण प्रबंधन, फसल विविधीकरण, समन्वित कृषि प्रणाली तथा पर्यावरण अनुकूल कृषि तकनीकों के महत्व की जानकारी दी गई। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में आईसीएआर–भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम के हेड (आईएफएस) डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने किसानों को वैज्ञानिक मृदा उर्वरता प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग, फसल विविधीकरण तथा एकीकृत कृषि प्रणाली के लाभों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने किसानों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ वैज्ञानिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

सेवानिवृत्त संयुक्त निदेशक डॉ. सतबीर सिंह सिरोही ने किसानों को कृषि क्षेत्र से संबंधित विभिन्न सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों की जानकारी दी। उन्होंने किसानों को योजनाओं का लाभ प्राप्त करने की प्रक्रिया समझाते हुए अधिक से अधिक लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में शिवम राठी ने किसानों को बायो-एनपीके एवं बायो-फॉस जैव उर्वरकों के उपयोग और लाभों के बारे में व्यावहारिक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जैव उर्वरक मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को प्रोत्साहित करने तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने मृदा स्वास्थ्य सुधार एवं पर्यावरण अनुकूल खेती में इनकी उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला। कार्यक्रम के दौरान किसानों को बायो-फॉस एवं बायो-एनपीके जैव उर्वरकों का वितरण किया गया। साथ ही धान बीज उपचार, पौधों की जड़ उपचार विधि एवं विभिन्न फसलों में इनके उपयोग की तकनीकी जानकारी भी प्रदान की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि जैव उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता में सुधार, पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि तथा खेती की लागत में कमी लाई जा सकती है।

कृषि अध्यापक प्रमोद कुमार ने किसानों को बाजार से असली कृषि खाद एवं कीटनाशक खरीदने के संबंध में जानकारी दी तथा खरीदारी के समय बिल अवश्य लेने की सलाह दी, जिससे उत्पादों की गुणवत्ता एवं प्रामाणिकता सुनिश्चित की जा सके। कार्यक्रम में एकीकृत कृषि प्रणाली, मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित पोषण प्रबंधन, फसल अवशेष प्रबंधन, जल संरक्षण एवं जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियों पर विशेष बल दिया गया। किसानों को इन आधुनिक तकनीकों को अपनाकर टिकाऊ कृषि उत्पादन एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया गया।

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