हाथरस 03 अक्टूबर। प्राचीन भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति केवल उपचार की व्यवस्था नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन जीने की समग्र पद्धति है और इसका उद्गम भारत की प्राचीन संस्कृति में हुआ है। नियमित योगासन, ध्यान और संतुलित शाकाहारी भोजन को जीवनशैली का हिस्सा बनाकर अनेक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से बचाव की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है। यह विचार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के अलीगढ़ रोड स्थित आनंदपुरी कॉलोनी केंद्र की राजयोग शिक्षिका बीके शांता बहन ने हाथरस के प्रसिद्ध मेला श्री दाऊजी महाराज में आयोजित आयुर्वेद शिविर के अंतर्गत जनपदीय आयुर्वेद सम्मेलन में व्यक्त किए। बीके शांता बहन ने रामचरितमानस की चौपाई “दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापा” का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में ऐसे समाज की कल्पना की गई है, जहां मनुष्य सुखी, स्वस्थ और संतुलित जीवन व्यतीत करे। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक दृष्टि से सतयुग को ऐसी अवस्था के रूप में माना जाता है, जहां बीमारी और दुख का अभाव होता है। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपने जीवन में संयम और देवत्व के गुणों से दूर होकर केवल भोग-विलास की ओर बढ़ता है तो उसका जीवन असंतुलित होने लगता है और यही असंतुलन विभिन्न प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं का कारण बन सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन परंपरा में स्वास्थ्य को लेकर व्यापक दृष्टिकोण रहा है और इसी परंपरा में आयुर्वेद का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने आयुर्वेद को भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर बताते हुए कहा कि स्वस्थ रहने के लिए केवल बीमारी होने के बाद उपचार करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि बीमारी से बचाव के लिए भी जीवनशैली पर ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने महात्मा गांधी के रामराज्य के विचार का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वस्थ, सुखी और मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने लोगों से आध्यात्मिकता, योग, ध्यान और सात्विक जीवनशैली को अपनाते हुए बेहतर समाज के निर्माण में सहयोगी बनने का आह्वान किया। इससे पूर्व जनपदीय आयुर्वेद सम्मेलन का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता वैद्य रमेश चंद्र उपाध्याय ने की, जबकि संयोजक वैद्य ठाकुर सिंह सोलंकी तथा महामंत्री वैद्य प्रेम रावत रहे। इस अवसर पर डॉ. विष्णु एवं डॉ. अवधेश सहित अन्य चिकित्सक एवं आयुर्वेद विशेषज्ञ मौजूद रहे।
सम्मेलन में विभिन्न वरिष्ठ वैद्यों ने भारत की प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के महत्व और उपयोगिता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने बताया कि आयुर्वेद की भारतीय चिकित्सा परंपरा में भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का देवता एवं प्रमुख प्रतीक माना जाता है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए उपचार के साथ-साथ खानपान और दैनिक जीवनशैली पर भी ध्यान देना जरूरी है। वक्ताओं ने नियमित योग, आसन एवं ध्यान करने के साथ संतुलित एवं शाकाहारी भोजन को स्वस्थ जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। कार्यक्रम में ब्लॉक प्रमुख रामेश्वर उपाध्याय ने भी सहभागिता की और लोगों से भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के महत्व को समझते हुए इसे अपनी जीवनशैली में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारतीय चिकित्सा परंपरा हमारी प्राचीन विरासत है, जिसके संरक्षण और प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है। इस अवसर पर ब्रह्माकुमारी संगठन की ओर से बीके पूजा बहन, गजेंद्र भाई सहित आयुर्वेद प्रेमी, चिकित्सक एवं अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सम्मेलन में आयुर्वेद और स्वस्थ जीवनशैली को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाने का संदेश दिया गया।










