
नई दिल्ली 04 अगस्त। सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे साइबर अपराधों पर सख्त रुख अपनाते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को साइबर धोखाधड़ी से जुड़े बैंक खातों, जिनमें ‘म्यूल अकाउंट्स’ भी शामिल हैं, से निपटने के लिए विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार कर जारी करने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने ‘इन री: विक्टिम्स ऑफ डिजिटल अरेस्ट रिलेटेड टू फोर्ज्ड डॉक्यूमेंट्स’ मामले में स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई करते हुए राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को साइबर ठगी के पीड़ितों के लिए शिकायत निवारण और धन वापसी की व्यवस्था को जल्द अपनाकर प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश दिए। अदालत ने RBI को तैयार SOP की प्रति सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को उपलब्ध कराने को कहा, जबकि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को लोगों को शिकायत निवारण एवं धन वापसी की उपलब्ध व्यवस्था के संबंध में व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से भी कहा कि वे अधीनस्थ अदालतों को इन व्यवस्थाओं की जानकारी उपलब्ध कराएं, ताकि साइबर ठगी के पीड़ित समय पर कानूनी उपायों का लाभ उठा सकें। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से साइबर धोखाधड़ी रोकथाम प्रणाली के तहत दर्ज और निस्तारित शिकायतों का राज्यवार एवं बैंकवार विवरण भी मांगा, जिससे एजेंसियों और बैंकों की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। इसके अलावा साइबर धोखाधड़ी की जांच के दौरान फ्रीज किए गए बैंक खातों से जुड़े मामलों का जल्द निपटारा करने के निर्देश दिए गए, ताकि निर्दोष खाताधारकों को अनावश्यक परेशानी न हो। पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा गठित अंतर-विभागीय समिति (IDC) को बैंकों एवं अन्य वित्तीय मध्यस्थों के साथ विचार-विमर्श कर ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे साइबर अपराधों पर रोक लगाने और पीड़ितों की ठगी गई रकम जल्द वापस दिलाने के लिए ठोस सुझाव तैयार करने को कहा। ये निर्देश सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया सुझाव के बाद आए हैं, जिसमें केंद्र सरकार से ‘डिजिटल अरेस्ट’ को आपराधिक कानून में औपचारिक रूप से परिभाषित करने और इसे कड़ी सजा वाले अलग अपराध के रूप में शामिल करने पर गंभीरता से विचार करने को कहा गया था।









