जननी करती उम्र भर ,
जीवन पथ आलोक ।
माँ के आगे क्षुद्र हैं ,
धरा, गगन , सुरलोक ।।-1

घाट-घाट का जल पिया,
बुझी न मन की प्यास ।
माँ के चरणों में हुआ ,
जन्नत का आभास ।।-2

हे मेरे भगवान जी ,
ऐसा दो आशीष ।
सारी उम्र झुका रहे ,
माँ के चरणों शीश ।।-3

वन्दनीय हैं जगत में ,
पिता गुरू भगवान ।
सबसे पहले सिर झुका ,
कर माँ का सम्मान ।।-4

बच्चा होता जगत में ,
कोरा पृष्ठ समान ।
माँ ने जैसा लिख दिया ,
वही प्राथमिक ज्ञान ।।-5

माँ के चरणों में झुका ,
अभिवादन को शीश ।
उठा हाथ माँ ने दिया ,
मंगलमय आशीष ।।-6

माँ के चरणों में किया ,
अर्पित जिसने प्यार ।
ईश्वर ने उसको दिए ,
खुशियों के उपहार ।।-7

इज्जत दौलत घर अना ,
सौम्य सुधारस वेन ।
जो कुछ मेरे पास है ,
सब कुछ माँ की देन ।।-8

माँ माखन,मिश्री ,सुधा ,
रोटी , गीता ज्ञान ।
माँ ममता की खान है ,
बच्चों की मुस्कान ।।-9

अनपढ़, सभ्य, सुशील थी ,
साक्षर जैसा ज्ञान ।
लड़ूँ लड़ाई तिमिर से ,
है माँ का वरदान ।।-10

 शिव कुमार ‘दीपक’
बहरदोई, सादाबाद
हाथरस (उ० प्र० )

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