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सिकन्दराराऊ (हसायन) 02 अक्टूबर। कस्बा के मोहल्ला किला खेडा स्थिति प्राचीन बगीची श्री हनुमान जी महाराज के मंदिर परिसर में श्रीराम युवा क्लब के तत्वावधान में आयोजित श्रीरामलीला महोत्सव के तहत पांचवे दिन बृहस्पतिवार एक अक्तूबर की रात्रि में वृंदावन के श्रीराधांचल लीला संस्थान के कलाकारों के द्वारा श्रीरामलीला महोत्सव के श्रीरामलीला कार्यक्रम का मंचन का आयोजन किया।श्रीरामलीला महोत्सव के कार्यक्रम के तहत श्रीरामलीला महोत्सव कार्यक्रम कमेटी के पदाधिकारियो व श्रीराधांचल लीला संस्थान के संचालक दल के कार्यकर्ताओ के द्वारा भगवान श्रीराम जानकी की आरती उतारकर स्तुति आराधना कर पांचवे दिन की श्रीराम जानकी विवाह के बाद अयोध्या कांड की लीला का मनोहारी भाव पूर्ण तरीके से मंचन कर कार्यक्रम प्रस्तुत किया।भगवान श्रीराम व उनके तीन अनुज भाईयो भरत,लक्ष्मण,शत्रुघ्न के विवाह कार्यक्रम के पश्चात अयोध्या वापिस आने के बाद राजा दशरथ एक दिन स्नान आदि से निवृत होने के बाद अपने घर पर लगे प्रतिबिम्ब दर्पण निहार रहे थे।तभी उन्हे अपने वृद्ध होने का अहसास हुआ।तो भगवान श्रीराम के पिता ने अपने ज्येष्ठ पुत्र भगवान श्रीराम को अयोध्या नगरी का राजा बनाए जाने के लिए गुरू वशिष्ठ,मंत्री सुमंत व नगर के अन्य प्रजातंत्र से वार्तालाप करने के बाद भगवान श्रीराम के राजा बनाए जाने के लिए कल यानि दूसरे दिन अयोध्या का राजा घोषित कर राज्याभिषेक की तैयारी कर ली गई।राजा दशरथ वृद्ध होने पर अपने बड़े पुत्र श्रीराम को अयोध्या का राजा बनाने का निर्णय लेते हैं और अयोध्या में सभी तैयारियां पूरी हो जाती हैं।इसी दरम्यान अयोध्या के राजा दशरथ की तीसरी रानी कैकेयी की दासी मंथरा ने भगवान श्रीराम के राजा बनाए जाने की चर्चा सुनकर भगवान श्रीराम को वन भेज जाने के लिए कुचक्र रच दिया। रानी कैकेयी की दासी मंथरा रानी कैकेयी के मन में यह जहर घोल देती है कि श्रीराम के राजा बनने से उसका और उसके पुत्र भरत का अहित होगा।इसी बात को लेकर कैकेयी के मन में युद्ध के दौरान छोडे गए दो वरदान मांगने के लिए कह दिया।श्रीरामलीला मंचन के दौरान मंथरा के बहकावे में आकर कैकेयी अयोध्या के अंदर बने हुए कोपभवन में जाती हैं।राजा दशरथ से अपने पुराने दो वरदान मांगती है।जिसमें पहला वरदान श्रीराम के स्थान पर भरत को राजसिंहासन और दूसरा श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का वनवास।रानी कैकेयी के द्वारा अपने दो वचनों में श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास भेजे जाने की खबर सुनते ही राजा दशरथ कोप भवन की धरती पर गिर पडते है।और कैकेयी से दूसरे वरदान में श्रीराम को वन भेजे जाने के लिए मांगे गए वचन को वापिस करने की व्यथित होकर गुहार करते है।मगर कैकेयी राजा दशरथ की किसी भी बात को तनिक नही सुनती है।जब भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष के लिए वनगमन करने की जानकारी मिलती है।तो श्रीराम अपने पिता के वचनों और सत्य की रक्षा के लिए श्रीराम तुरंत वन जाने को तैयार हो जाते हैं।भगवान श्रीराम के राजा नही बनने की बात और चौदह वर्ष के वनवास होने की खबर मिलते ही अयोध्या में हर कोई व्यथित हो जाता है।भगवान श्रीराम जानकी के विवाह के बाद हुई अयोध्या कांड लीला ने सभी जनमानस श्रोताओं को भी व्यथित कर दिया।

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