होली के रंग, दीपक के संग

रंग पर्व अब देश में, लाये नई बहार ।
जले होलिका द्वेष की, मन में पनपे प्यार ।।

रीत प्रेम सद भाव की,अदभुत एक मिसाल ।
प्रेम विरोधी से मिला, लेकर रंग गुलाल ।।

प्रेम -रीत सद भाव का, होली का त्यौहार ।
आओ मिलकर सब करें, रंगो की बौछार ।।

लस्सी पीलो दूध की , भांग जरा सी घोल ।
तभी तुम्हें मालूम हो , होती धरती गोल ।।

गोरे तेरे गात पर , चमके रंग अबीर ।
मन को ऐसा लग रहा, ज्यों जम्मू कश्मीर ।।

गले मिले जब प्यार से, रॉबिन, राम, हमीद ।
अनुभूति हुए पर्व सब,क्रिसमस, होली,ईद ।।

इत नफरत की भावना, उत बदले का भाव ।
होली पर सब तक रहे , अपने-अपने दाव ।।

जला द्वेष की होलिका, बरसा प्रेम अबीर ।
गले प्रेम से मिल रहे , रॉबिन, राम, सगीर ।।

हिन्दू होली पर मिलें , शेख शराफत ईद ।
‘दीपक’वे हर दिन मिलें, इंशा राम, हमीद ।।

फीके-फीके लग रहे , रंग गुलाल अबीर ।
बदली द्वेष घमण्ड ने , होली की तस्वीर ।।

रंग ,गुलाल , अबीर का, होली का त्यौहार ।
कीचड़,भांग,शराब ने, रूप किया बेकार ।।

सरसों झूमे खेत में , पीली चादर ओड़ ।
नैन लड़ावे बाबरा , गेंहूँ करने जोड़ ।।

हुईं तरुण अब डालियां,मधुमय भरी जमीन ।
कलियां घूँघट खोलती , जैसे नारि नवीन ।।

कली-कली को बाग में , मधुप सुनायें राग ।
मस्त हुए रसपान में , लिपटे पदम पराग ।।

मन में हो सद्भावना , वाणी में मधुभाष ।
जले द्वेष की होलिका,शुचि हो होली काश ।।

कवि शिव कुमार ‘दीपक’- बहरदोई ,सादाबाद (हाथरस) उ०प्र०
पिन- 281307