
हाथरस 07 सितम्बर। पशुपालन विभाग की ओर से पशुपालकों को लम्पी स्किन डिजीज (एलएसडी) को लेकर सतर्क रहने की अपील की गई है। यह विषाणु जनित रोग है, जो पशुओं के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। विभाग ने पशुपालकों से रोग के लक्षण दिखाई देने पर तत्काल निकटतम पशु चिकित्साधिकारी को सूचना देने और प्रभावित पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखने की अपील की है। लम्पी स्किन डिजीज से प्रभावित पशुओं में तेज बुखार, आंख और नाक से पानी गिरना, पैरों में सूजन तथा पूरे शरीर पर कठोर एवं चपटी गांठें जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कई मामलों में सिर, गर्दन, थूथन, थन, गुदा तथा अंडकोष अथवा योनिमुख के आसपास भी गांठों के उभार दिखाई देने लगते हैं। गंभीर स्थिति में पूरा शरीर इन गांठों से ढक सकता है। गांठों में नेक्रोटिक एवं अल्सरेटिव घाव भी विकसित हो सकते हैं, जिससे मक्खियों के माध्यम से अन्य स्वस्थ पशुओं में संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। गंभीर रूप से प्रभावित पशुओं में श्वसन एवं जठरांत्र संबंधी तंत्र में भी घाव विकसित हो सकते हैं। श्वसन पथ में घाव होने पर पशु को सांस लेने में कठिनाई हो सकती है। इसके अलावा पशु का वजन कम होने, शरीर कमजोर पड़ने तथा गाभिन पशुओं में गर्भपात की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। दुधारू गायों में दुग्ध उत्पादन में भी काफी कमी आ सकती है।
विभाग ने रोग के प्रकोप की स्थिति में पशुपालकों को प्रभावित पशुओं का आवागमन प्रतिबंधित करने तथा उन्हें स्वस्थ पशुओं से अलग रखने की सलाह दी है। पशुओं को हमेशा साफ पानी पिलाने के साथ ही मच्छर, मक्खी और किलनी आदि से बचाने के लिए पशु चिकित्साधिकारी की सलाह के अनुसार कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करने को कहा गया है। पशुबाड़े और पशु खलिहान में फिनायल अथवा सोडियम हाइपोक्लोराइट आदि का छिड़काव कर नियमित रूप से कीटाणुशोधन करने की भी सलाह दी गई है। बीमार पशुओं की देखभाल करने वाले व्यक्तियों को स्वस्थ पशुओं के बाड़े से दूर रखने तथा पशुओं की देखभाल के दौरान स्वच्छता का विशेष ध्यान रखने को कहा गया है। पशुपालकों को सलाह दी गई है कि पहले स्वस्थ पशुओं को चारा-पानी दें और इसके बाद बीमार पशुओं की देखभाल करें। बीमार पशुओं के संपर्क में आने के बाद हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोना चाहिए। विभागीय निर्देशों के अनुसार पशु के दूध को उबालकर सेवन करने की सलाह भी दी गई है।
विभाग ने पशुपालकों से अपील की है कि रोग के प्रकोप के दौरान पशुओं को सामूहिक चराई के लिए न भेजें और न ही पशु मेले अथवा प्रदर्शनियों में लेकर जाएं। प्रभावित क्षेत्रों से पशु खरीदकर लाने से भी बचने की सलाह दी गई है। बीमार और स्वस्थ पशुओं को एक साथ चारा-पानी नहीं कराना चाहिए। यदि किसी प्रभावित पशु की मृत्यु हो जाती है तो उसके शव को खुले में न फेंककर वैज्ञानिक विधि से दफनाने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही रोगी पशु का दूध बछड़े को न पिलाने की सलाह दी गई है। पशुपालन विभाग ने पशुपालकों से किसी भी प्रकार के लक्षण दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेने की अपील की है। किसी भी कठिनाई या जानकारी के लिए जनपद स्तर पर स्थापित कंट्रोल रूम के प्रभारी डॉ. सुधीर कुमार, उप मुख्य पशुचिकित्साधिकारी, हाथरस सदर के मोबाइल नंबर 9411475570 तथा योजना के जनपदीय नोडल अधिकारी डॉ. मुकेश कुमार, उप मुख्य पशुचिकित्साधिकारी, हाथरस (चिकित्सा एवं स्वास्थ्य) के मोबाइल नंबर 9891139131 पर 24 घंटे संपर्क किया जा सकता है।













