
हाथरस/सहपऊ 05 सितम्बर। साइबर ठगी और वित्तीय धोखाधड़ी का नेटवर्क अब केवल बैंक खातों तक सीमित नहीं रह गया है। जांच में सामने आए तथ्यों के अनुसार साइबर ठग आम लोगों को झांसे में लेकर अथवा धोखाधड़ी से खोले गए बैंक खातों का इस्तेमाल ठगी की रकम को इधर-उधर भेजने और मनी लॉन्ड्रिंग के लिए कर रहे हैं। इस रकम को छिपाने और उसका स्रोत बदलने के लिए म्यूल बैंक खातों, क्रिप्टो करेंसी, ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल वॉलेट का इस्तेमाल किए जाने की आशंका जांच एजेंसियों के सामने है। प्रवर्तन निदेशालय की विभिन्न साइबर अपराध जांचों में भी म्यूल खातों के जरिए रकम की लेयरिंग और उसके बाद क्रिप्टो में रूपांतरण के मामले सामने आ चुके हैं।
सहपऊ मामले की जांच कर रही जोधपुर पुलिस की टीम अब तक कथित तौर पर लेयर-1, लेयर-2 और लेयर-3 यानी बैंक खातों के शुरुआती चक्र तक पहुंच सकी है। पुलिस ने उन लोगों की पहचान की है, जिन पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए म्यूल अकाउंट खुलवाने में भूमिका निभाने का आरोप है। हालांकि तीसरी लेयर के बाद ठगी की रकम कहां गई और किस माध्यम से उसे ठिकाने लगाया गया, यह पता लगाना जांच एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। मामला सामने आने के बाद सहपऊ पुलिस ने भी कथित तौर पर खाता खुलवाने वाले आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की है, लेकिन मुख्य साजिशकर्ताओं तक पुलिस की पहुंच अभी जांच का अहम हिस्सा बनी हुई है।
जांच एजेंसियों के अनुसार साइबर ठगी की रकम सबसे पहले म्यूल खातों में पहुंचाई जाती है। इसके बाद रकम को तेजी से कई बैंक खातों में छोटे-छोटे हिस्सों में ट्रांसफर किया जाता है। इसी प्रक्रिया को लेयरिंग कहा जाता है। एक ही रकम को कई खातों और डिजिटल माध्यमों से घुमाने का उद्देश्य उसके वास्तविक स्रोत को छिपाना और जांच एजेंसियों के लिए ट्रांजेक्शन की पूरी कड़ी को जोड़ना मुश्किल बनाना होता है। प्रवर्तन निदेशालय की जांचों में भी हजारों म्यूल खातों के जरिए साइबर अपराध की रकम को कई स्तरों पर घुमाने के मामले सामने आए हैं।
जांच में यह भी सामने आया है कि बैंकिंग चैनल की कई परतों के बाद साइबर अपराध की रकम को क्रिप्टो करेंसी में बदलने की कोशिश की जाती है। यूएसडीटी, बिटकॉइन जैसी वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के जरिए रकम को दूसरे डिजिटल वॉलेट में ट्रांसफर किया जा सकता है। ईडी की हालिया जांचों में भी साइबर फ्रॉड की रकम के क्रिप्टो में रूपांतरण और अलग-अलग वॉलेट के जरिए उसे आगे भेजने के मामले सामने आए हैं।
इसके अलावा ऑनलाइन गेमिंग, बेटिंग और डिजिटल वॉलेट जैसे माध्यमों के इस्तेमाल की भी जांच की जा रही है। ऐसे मामलों में रकम को अलग-अलग डिजिटल लेनदेन के जरिए घुमाकर उसके मूल स्रोत को छिपाने का प्रयास किया जाता है। हालांकि सहपऊ मामले में तीसरी लेयर के बाद वास्तव में रकम किस प्लेटफॉर्म, वॉलेट अथवा व्यक्ति तक पहुंची, इसकी पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
फिलहाल जोधपुर पुलिस मामले की जांच आगे बढ़ा रही है। स्थानीय पुलिस भी खाता खुलवाने वाले युवकों और उन खातों में आई रकम के जरिए साइबर फ्रॉड के पूरे नेटवर्क तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। जांच एजेंसियां डिजिटल ट्रेल के आधार पर संदिग्ध क्रिप्टो वॉलेट, पी-टू-पी लेनदेन और अन्य डिजिटल माध्यमों की कड़ियां जोड़ने में जुटी हैं। यदि इन कड़ियों को जोड़ने में सफलता मिलती है तो सहपऊ से शुरू हुई जांच साइबर ठगी के बड़े अंतरराज्यीय अथवा अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तक पहुंच सकती है।









