हाथरस 04 सितम्बर। भगवान श्रीकृष्ण की महिमा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों में भी उनके प्रति आस्था और सम्मान देखने को मिलता है। इसका प्रमाण विभिन्न देशों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण, राधा रानी और श्रीमद्भगवद्गीता से जुड़े प्रसंगों पर जारी किए गए डाक टिकट हैं। डाक टिकट संग्रहकर्ता शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ के अनुसार, दुनिया के कई देशों ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और भारतीय संस्कृति से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंगों को डाक टिकटों के माध्यम से सम्मान दिया है। शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ ने बताया कि भारत में जहां मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है, वहीं देशभर में भी भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान कृष्ण की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी किसी परिवार में पुत्र जन्म होने पर खुशी में अक्सर कहा जाता है कि ‘नंद के घर लाला हुआ है।’
उन्होंने बताया कि दक्षिण अमेरिकी देश गयाना ने भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी को होली खेलते हुए दर्शाने वाले डाक टिकट जारी किए थे। ये डाक टिकट ‘फगवा फेस्टिवल’ के नाम से वर्ष 1969 में जारी किए गए थे। इनमें एक डाक टिकट 25 सेंट तथा दूसरा 6 सेंट मूल्य का था। दोनों टिकटों पर भगवान कृष्ण और राधा रानी को होली खेलते हुए दर्शाया गया है। इसी प्रकार पड़ोसी देश नेपाल ने भी भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी पर डाक टिकट जारी किया है। 15 पैसे मूल्य के इस डाक टिकट में भगवान कृष्ण को राधा रानी के साथ बांसुरी बजाते हुए दर्शाया गया है। यह टिकट कृष्णाष्टमी के अवसर पर जारी किया गया था तथा इस पर संवत का उल्लेख भी किया गया है। नेपाल द्वारा पाटन स्थित प्रसिद्ध श्रीकृष्ण मंदिर पर भी डाक टिकट जारी किया जा चुका है। शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ के मुताबिक, भारत में भी श्रीमद्भगवद्गीता को डाक टिकट के माध्यम से सम्मान दिया गया है। 25 नए पैसे मूल्य के इस डाक टिकट पर भगवान कृष्ण को अर्जुन के सारथी के रूप में रथ पर विराजमान दिखाया गया है। साथ ही अर्जुन को भी रथ पर बैठे हुए दर्शाया गया है। टिकट पर श्रीमद्भगवद्गीता का प्रसिद्ध श्लोक ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ अंकित है। उन्होंने कहा कि ये डाक टिकट केवल संग्रह करने योग्य वस्तुएं नहीं, बल्कि सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति और भगवान श्रीकृष्ण की वैश्विक स्वीकार्यता की ऐतिहासिक धरोहर हैं। इन टिकटों के माध्यम से भारतीय आध्यात्मिक चिंतन, श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन और गीता के संदेश को दुनिया के सामने सम्मान के साथ प्रस्तुत किया गया है।
हाथरसी मैया मंदिर पर डाक टिकट जारी करने की मांग
शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ ने केंद्र सरकार से हाथरस के धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए हाथरसी मैया मंदिर पर डाक टिकट जारी करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय भगवान शंकर और माता पार्वती ब्रज क्षेत्र की ओर जाते हुए हाथरस में रुके थे। मान्यता है कि यहां माता पार्वती को प्यास लगने पर भगवान शंकर ने पत्तियों से रस निकालकर उन्हें पिलाया, जिसके चलते इस स्थान का नाम हाथरस पड़ा। उन्होंने बताया कि आज भी इस धार्मिक परंपरा से जुड़े स्थल पर हाथरसी मैया का मंदिर और वीरेश्वर महादेव मंदिर मौजूद हैं। ऐसे में हाथरस की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाने के लिए हाथरसी मैया मंदिर पर डाक टिकट जारी किया जाना महत्वपूर्ण कदम होगा। शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि हाथरस की इस धार्मिक विरासत और ऐतिहासिक मान्यता को डाक टिकट के माध्यम से देश-दुनिया के सामने लाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस सांस्कृतिक धरोहर से परिचित हो सकें।













