
हाथरस 05 जुलाई । कभी देश की प्रमुख कपास बेल्ट और सूत उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहे हाथरस सहित ब्रज क्षेत्र के चार जिलों—हाथरस, अलीगढ़, मथुरा और आगरा—का केंद्र सरकार की कपास क्रांति योजना में चयन किया गया है। योजना के तहत इन जिलों में 30-30 किसानों के समूह बनाकर उन्हें वर्ष में दो बार कपास की उन्नत खेती, आधुनिक तकनीकों और बेहतर उत्पादन के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। साथ ही किसानों को 7,500 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से अनुदान भी उपलब्ध कराया जाएगा। कृषि विभाग का मानना है कि ब्रज क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु कपास की खेती के लिए बेहद अनुकूल है। एक समय हाथरस की पहचान केवल हींग और उद्योगों से नहीं, बल्कि कपास उत्पादन और सूत उद्योग से भी होती थी। यहां की कॉटन मिलों में तैयार सूत देशभर के बाजारों में भेजा जाता था। लेकिन वर्ष 1980 के दशक में कॉटन मिलों के बंद होने के साथ ही कपास की खेती भी धीरे-धीरे लगभग समाप्त हो गई। वर्तमान समय में हाथरस जिले के मुरसान क्षेत्र में करीब 200 हेक्टेयर भूमि पर ही कपास की खेती हो रही है। कपास की बुवाई अप्रैल माह में की जाती है। ऐसे में सरकार आगामी बुवाई सीजन से पहले अधिक से अधिक किसानों को इस योजना से जोड़कर कपास उत्पादन को बढ़ावा देना चाहती है। जिला कृषि अधिकारी निखिल देव तिवारी ने बताया कि हाथरस सहित पूरे ब्रज क्षेत्र की भूमि और जलवायु कपास उत्पादन के लिए उपयुक्त है। आधुनिक तकनीक, उन्नत किस्म के बीज और वैज्ञानिक खेती अपनाकर उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।
2030-31 तक कपास उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने का लक्ष्य
भारत, चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक और उपभोक्ता देश है। इसके बावजूद देश को कपास का आयात करना पड़ता है। इसी स्थिति को बदलने के लिए केंद्र सरकार ने 2030-31 तक कपास उत्पादकता मिशन के तहत भारत को कपास उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए 5,659.22 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है। खेत से रेशा, रेशे से फैक्टरी, फैक्टरी से फैशन और फैशन से विदेश” के विजन के साथ कपास क्रांति योजना लागू की गई है, जिसका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ वस्त्र उद्योग को भी नई गति देना है।
कभी हाथरस की कॉटन मिलों की पूरे देश में थी पहचान
बिजली कॉटन मिल के पूर्व कर्मचारी गिरजेश कुमार कुलश्रेष्ठ बताते हैं कि एक समय हाथरस की बिजली कॉटन मिल की देशभर में अलग पहचान थी। इसके मालिक आगरा के उद्योगपति सेठ रामबाबूलाल थे। उस दौर में हाथरस में छोटी-बड़ी करीब 25 कॉटन मिलें संचालित होती थीं। वर्ष 1970-71 में देश की 103 कॉटन मिलों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें राष्ट्रीय वस्त्र निगम के अधीन कर दिया गया। इसके बाद धीरे-धीरे अव्यवस्थाएं बढ़ीं, उत्पादन प्रभावित हुआ और मिलें घाटे में जाने लगीं। अंततः 1982 से 1988 के बीच हाथरस की सभी कॉटन मिलें बंद हो गईं, जिससे कपास उद्योग और किसानों दोनों को बड़ा झटका लगा।
राजस्थान और पंजाब से भी आती थी कपास
आजादी से पहले हाथरस की मंडियों में राजस्थान और पंजाब से भी बड़ी मात्रा में कपास आती थी। विभाजन के बाद कपास उत्पादक कई क्षेत्र पाकिस्तान में चले गए, फिर भी व्यापार जारी रहा। हाथरस में कपास से सूत तैयार किया जाता था और प्रकाश टेक्सटाइल फैक्टरी में कपड़ा भी बनाया जाता था। शहर की प्रसिद्ध रुई मंडी उसी गौरवशाली दौर की पहचान है, हालांकि अब यहां कपास का कारोबार लगभग समाप्त हो चुका है। किसान आज़ाद सिंह बताते हैं कि आज भी हाथरस और मथुरा की राया मंडी में कपास की बिक्री होती है। कपास का सामान्य उपयोग रजाई और गद्दों में किया जाता है, जबकि बचा हुआ माल गुजरात की कॉटन मिलों को भेजा जाता है। वहीं, कॉटन उद्योग के जानकार लक्ष्मीपति सेकसरिया का कहना है कि लगभग 35-40 वर्ष पहले हाथरस की पहचान कपास और कॉटन मिलों से होती थी। यदि सरकार की कपास क्रांति योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है और किसानों को उत्पादन का उचित मूल्य व बेहतर बाजार मिलता है, तो हाथरस में एक बार फिर कपास की खेती का स्वर्णिम दौर लौट सकता है और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।


























