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हाथरस 15 जून । विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस पर जहां बुजुर्गों के सम्मान और सुरक्षा को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे थे, वहीं सिकन्द्राराऊ क्षेत्र से सामने आए एक मामले ने पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक संवेदनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 80 वर्षीय सुखराम और उनकी 70 वर्षीय पत्नी सावित्री देवी ने अपनी बहुओं पर उपेक्षा, मानसिक प्रताड़ना तथा समय पर भोजन न देने जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए पुलिस से सहायता की गुहार लगाई है। कोतवाली सिकन्द्राराऊ पहुंचे वृद्ध दंपती ने बताया कि जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर उन्हें परिवार के सहयोग और देखभाल की आवश्यकता है, लेकिन इसके विपरीत उन्हें लगातार उपेक्षा और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि बहुएं उन्हें समय पर भोजन नहीं देतीं और अक्सर अपमानजनक व्यवहार करती हैं। परिवार के बीच रहते हुए भी वे स्वयं को असहाय और अकेला महसूस कर रहे हैं। सावित्री देवी ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि कुछ समय पूर्व उनकी आंखों का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें आराम नहीं मिल सका। उनका आरोप है कि उन्हें लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने के लिए मजबूर किया जाता है। चूल्हे के धुएं से उनकी आंखों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और एक आंख की रोशनी भी प्रभावित हो गई। उन्होंने कहा कि बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्हें मजबूरी में घरेलू कार्य करने पड़ रहे हैं। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब समाज को बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस मनाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बुजुर्गों के साथ होने वाला मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न अक्सर घर की चारदीवारी तक सीमित रह जाता है और समय पर सामने नहीं आ पाता। मामले की शिकायत मिलने के बाद कोतवाली पुलिस ने इसे गंभीरता से लिया है। पुलिस अधिकारियों ने दंपती को आश्वासन दिया है कि पहले परिवार के सदस्यों को बुलाकर वार्ता एवं समझाइश का प्रयास किया जाएगा। यदि इसके बाद भी स्थिति में सुधार नहीं होता और बुजुर्गों के साथ अमानवीय व्यवहार जारी रहता है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सुखराम और सावित्री देवी का कहना है कि उन्हें किसी आर्थिक सहायता से अधिक अपने परिवार से सम्मान, सुरक्षा और अपनापन चाहिए। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि उन्हें जीवन के अंतिम वर्षों में सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार दिलाया जाए। यह घटना एक बार फिर समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि बुजुर्गों की देखभाल केवल पारिवारिक दायित्व नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता की सबसे बड़ी कसौटी भी है।

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