
हाथरस 16 अप्रैल।सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने का निर्णय लिया है, जिसमें 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन अधिनियम के तहत उत्तराधिकार और वसीयत संबंधी प्रावधानों को महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण बताया गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल इस याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। यह याचिका लखनऊ की वकील पौलोमी पाविनी शुक्ला और आयशा जावेद द्वारा ‘न्याया नारी फाउंडेशन’ के माध्यम से दायर की गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अधिवक्ता निहाल अहमद ने तर्क दिया कि शरीयत में उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े प्रावधान “आवश्यक धार्मिक प्रथाएँ” नहीं हैं, बल्कि सिविल मामलों से जुड़े हैं। भूषण ने कहा कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलना स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है, साथ ही यह भी बताया कि मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति के केवल एक-तिहाई हिस्से तक ही वसीयत कर सकता है, जिससे वह अपनी पूरी संपत्ति के संबंध में स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पाता।आपको बतादें एड पौलोमी पाविनी शुक्ला हाथरस के रहने वाले आईएएस प्रशांत शर्मा की धर्मपत्नी हैं।

























