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लखनऊ 21 फरवरी । उत्तर प्रदेश में आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव (ग्राम प्रधान, बीडीसी और जिला पंचायत सदस्य) को लेकर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है। ग्राम पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल आगामी 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए समय पर चुनाव होने की संभावना बेहद कम नजर आ रही है। राज्य निर्वाचन आयोग ने फाइनल मतदाता सूची के प्रकाशन की तारीख अब बढ़ाकर 15 अप्रैल 2026 कर दी है। जानकारों का मानना है कि मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद महज एक महीने के भीतर आरक्षण निर्धारण, नामांकन, चुनाव प्रचार और मतदान जैसी जटिल प्रक्रियाओं को पूरा करना व्यावहारिक रूप से लगभग असंभव है।

इस देरी का सबसे बड़ा तकनीकी कारण समर्पित पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग का अब तक गठन न होना है। सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2010 के फैसले के अनुसार, निकाय या पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ की प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य है। इसके लिए एक समर्पित आयोग का गठन कर पिछड़ेपन का डेटा जुटाना और सर्वे करना होता है। चूंकि पिछले आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में समाप्त हो चुका है और नए आयोग के गठन की प्रक्रिया अभी पाइपलाइन में है, इसलिए आरक्षण सूची तैयार होने में महीनों का समय लग सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में सरकार ने भी स्वीकार किया है कि आयोग के गठन के बाद ही चुनाव की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा।

यदि 26 मई तक ग्राम प्रधानों के चुनाव संपन्न नहीं होते हैं, तो संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार ग्राम पंचायतों में प्रशासकों (एडीओ पंचायत या अन्य अधिकारी) की नियुक्ति की जा सकती है। नियमतः कार्यकाल समाप्त होने के 6 महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ओबीसी आरक्षण के पेच और तकनीकी अड़चनों के कारण ये चुनाव वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद तक टल सकते हैं। हालांकि पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर समय पर चुनाव कराने का दावा कर रहे हैं, लेकिन निर्वाचन आयोग के बदले हुए कार्यक्रम और ‘ट्रिपल टेस्ट’ की अनिवार्यता ने भावी प्रत्याशियों के बीच बेचैनी बढ़ा दी है। फिलहाल, गांवों की सरकार का भविष्य अधर में लटका नजर आ रहा है।

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