सिकन्दराराऊ 17 जून। सरकार द्वारा निबंधन (रजिस्ट्री) कार्यालयों के कार्यों को निजी कंपनियों को सौंपे जाने के प्रस्ताव के विरोध में अधिवक्ताओं, कातिबों, स्टाम्प विक्रेताओं एवं टाइपिस्टों का आंदोलन बुधवार को आठवें दिन भी जारी रहा। उप-पंजीयक कार्यालय परिसर में आयोजित धरना-प्रदर्शन एवं कलमबंद हड़ताल के दौरान आंदोलनकारियों ने सरकार की प्रस्तावित निजीकरण नीति के खिलाफ जोरदार विरोध दर्ज कराते हुए इसे जनविरोधी और रोजगार विरोधी कदम बताया। धरना सभा की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता डी.के. चौहान ‘शोला’ एडवोकेट ने की, जबकि संचालन वीरपाल सिंह एडवोकेट ने किया। वक्ताओं ने कहा कि निबंधन विभाग के निजीकरण से अधिवक्ताओं, कातिबों, स्टाम्प विक्रेताओं एवं टाइपिस्टों सहित हजारों लोगों की आजीविका प्रभावित होगी। इसके साथ ही आम जनता को अतिरिक्त आर्थिक बोझ एवं अनावश्यक जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। अपने संबोधन में डी.के. चौहान ने कहा कि आंदोलन को आठ दिन बीत जाने के बावजूद सरकार की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से संचालित किया जा रहा है, लेकिन शासन की उदासीनता आंदोलनकारियों में रोष पैदा कर रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि निजीकरण संबंधी प्रस्ताव शीघ्र वापस नहीं लिया गया तो आंदोलन को और व्यापक तथा उग्र रूप दिया जाएगा। इसी क्रम में दी बार एसोसिएशन सिकन्द्राराऊ का एक प्रतिनिधिमंडल जिलाधिकारी हाथरस से मिला और मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के नाम संबोधित ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधिमंडल ने निबंधन विभाग के निजीकरण संबंधी प्रस्ताव को तत्काल निरस्त करने की मांग करते हुए कहा कि यह निर्णय अधिवक्ताओं, कातिबों, स्टाम्प विक्रेताओं, टाइपिस्टों तथा आम जनता के हितों के प्रतिकूल है। ज्ञापन में कहा गया कि निजीकरण लागू होने से न केवल हजारों लोगों के रोजगार पर संकट उत्पन्न होगा, बल्कि रजिस्ट्री संबंधी कार्यों में आम नागरिकों को अतिरिक्त शुल्क, बिचौलियागिरी तथा अन्य व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। जिलाधिकारी ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया कि उनकी मांगों से संबंधित ज्ञापन को प्राथमिकता के आधार पर शासन स्तर तक भेजा जाएगा। धरना सभा में वक्ताओं ने कहा कि निबंधन विभाग जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक सेवा क्षेत्र का निजीकरण पारदर्शिता एवं जवाबदेही के लिए भी चुनौती साबित हो सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ आम जनता के हित प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सरकार को जनभावनाओं का सम्मान करते हुए प्रस्ताव को तत्काल वापस लेना चाहिए। आंदोलन में शामिल अधिवक्ताओं, कातिबों, स्टाम्प विक्रेताओं एवं टाइपिस्टों ने एकजुटता का परिचय देते हुए कहा कि यह संघर्ष केवल रोजगार बचाने का नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों एवं पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था की रक्षा का भी है। सभी ने मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रखने का संकल्प दोहराया। इस अवसर पर नरेश प्रताप, रनवीर सिंह पुंडीर, मुरारी लाल, गोरीशंकर गुप्ता, जयप्रकाश गुप्ता, वीरपाल सिंह, राजेश बघेल, रामकुमार यादव, महेश अंजना, प्रमोद बघेल, अशोक कुमार शर्मा, जितेन्द्र यादव (सचिव), देवकांत कौशिक, मुनेश शर्मा, हिमांशु शर्मा, रुपेन्द्र बघेल, जितेन्द्र सिंह, राजेश यादव, देवेंद्र बघेल, भगवान सिंह, अरशद अली, राहुल वर्मा, प्रियांशु दरगढ़, समीर यादव, विजय यादव, अवधेश यादव, दीपेश पाठक, राधेश्याम बघेल,आनन्द कुमार सिंह, गिरीश यादव, रंजीत पौरुष सजीव यादव (कातिब), धनीराम (कातिब), केदार सिंह, राजकुमार (कातिब), अमर सिंह, बेनीराम, विश्वविजयी, देवेन्द्र प्रताप, यशपाल,दीपक यादव अमित कुमार सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता, कातिब, स्टाम्प विक्रेता एवं टाइपिस्ट उपस्थित रहे।


























