Hamara Hathras

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हाथरस 15 अगस्त। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हाथरस के इतिहास और स्वतंत्रता संघर्ष की गौरवशाली स्मृतियां एक बार फिर चर्चा में हैं। हाथरस के किले में स्थित प्राचीन दाऊजी मंदिर आज भी राजा दयाराम और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच वर्ष 1817 में हुए संघर्ष की ऐतिहासिक गवाही देता है। मंदिर परिसर में आज भी उस दौर के कई तोप के गोले सुरक्षित रखे हुए हैं, जबकि मंदिर के गुंबद पर तोप के हमले के निशान भी बताए जाते हैं। डाक टिकट एवं सिक्का संग्रहकर्ता शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ के अनुसार, वर्ष 1817 में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने राजा दयाराम के किले पर भीषण हमला किया था। इस दौरान किले के अधिकांश हिस्से को नुकसान पहुंचाया गया और शस्त्र भंडार गृह में आग लगा दी गई। दाऊजी मंदिर को भी तोप के गोलों से निशाना बनाया गया था। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि भगवान दाऊजी महाराज की कृपा से मंदिर को कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। मंदिर में सुरक्षित ये तोप के गोले और गुंबद पर मौजूद निशान आज भी उस दौर के संघर्ष की याद दिलाते हैं।

शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ ने बताया कि इतिहास को सहेजने में डाक टिकटों और सिक्कों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। उनके संग्रह में स्वतंत्र भारत की पहली डाक टिकट से संबंधित लिफाफा मौजूद है, जिसकी कीमत डेढ़ आना थी और जिस पर अशोक की लाट के साथ ‘जय हिंद’ तथा 15 अगस्त 1947 अंकित है। उनके संग्रह में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर समय-समय पर जारी डाक टिकटों के अलावा आजाद हिंद सरकार, सुभाष चंद्र बोस, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, जलियांवाला बाग के शहीदों, तिरंगे, हाथरस के राजा महेंद्र प्रताप सिंह, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद सहित अनेक देशभक्तों के सम्मान में जारी डाक टिकट भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि शहीदों और देशभक्तों पर जारी डाक टिकट केवल संग्रह की वस्तुएं नहीं, बल्कि देश के इतिहास, त्याग, बलिदान और राष्ट्रप्रेम के जीवंत दस्तावेज हैं। ये डाक टिकट युवाओं को अपने देश के गौरवशाली अतीत से परिचित कराने के साथ राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी और कर्तव्य का संदेश भी देती हैं। उनके अनुसार डाक टिकट ऐतिहासिक घटनाओं और आंदोलनों को लंबे समय तक याद रखने का माध्यम हैं तथा विविधता में एकता, अहिंसा, शांति और राष्ट्र की अखंडता का संदेश भी देती हैं। शैलेंद्र वार्ष्णेय ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस पर हाथरस के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी स्मरण करना आवश्यक है। हाथरस के राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित किया, वहीं राजा दयाराम ने अंग्रेजी सत्ता के सामने झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। आज भी हाथरस का किला और दाऊजी मंदिर परिसर में सुरक्षित तोप के गोले तथा हमले के निशान उस दौर के संघर्ष और स्वाभिमान की कहानी कहते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करना और नई पीढ़ी को इनके महत्व से परिचित कराना सभी की जिम्मेदारी है।

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