
हाथरस 18 जुलाई। रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया और डीएपी के अनियंत्रित एवं असंतुलित प्रयोग से हाथरस जिले की कृषि भूमि की उर्वरता लगातार घट रही है। कृषि विभाग की वर्ष 2025-26 की न्यूट्रिएंट इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार जिले के सभी सातों ब्लॉकों की मिट्टी में प्रमुख पोषक तत्व नाइट्रोजन और पोटाश की गंभीर कमी पाई गई है, जबकि फॉस्फोरस का स्तर मध्यम श्रेणी में दर्ज किया गया है। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से संतुलित उर्वरक उपयोग के साथ जैविक खाद अपनाने की अपील की है। रिपोर्ट के अनुसार जिले में नाइट्रोजन का औसत सूचकांक 1.39 दर्ज किया गया है, जो बेहद कम स्तर को दर्शाता है। सहपऊ ब्लॉक में यह सबसे कम 1.31 रहा, जबकि सिकंदराराऊ में 1.45 दर्ज किया गया। इसके अलावा हसायन, हाथरस, मुरसान, सादाबाद और सासनी सहित सभी ब्लॉक नाइट्रोजन के मामले में न्यून स्तर पर हैं। वहीं पोटाश का औसत सूचकांक 1.99 पाया गया, जो भी चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है। हालांकि फॉस्फोरस का औसत 2.56 होने से इसकी स्थिति अपेक्षाकृत संतोषजनक है। राहत की बात यह है कि जिंक, आयरन, सल्फर सहित अधिकांश सूक्ष्म पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध पाए गए हैं। मृदा परीक्षण प्रयोगशाला के अध्यक्ष कैलाश सिंह ने बताया कि लगातार एक के बाद एक फसल लेने और केवल यूरिया व डीएपी पर निर्भर रहने से मिट्टी के प्राकृतिक पोषक तत्व तेजी से समाप्त हो रहे हैं। इससे न केवल मिट्टी की उर्वरता घट रही है, बल्कि अगली फसलों की पैदावार भी प्रभावित हो रही है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. बलवीर सिंह ने किसानों को सलाह दी कि वे अपने खेतों की मिट्टी की नियमित जांच कराएं और मृदा स्वास्थ्य कार्ड की संस्तुतियों के अनुसार ही उर्वरकों का प्रयोग करें। उन्होंने गोबर की सड़ी खाद, कम्पोस्ट तथा ढैंचा और सनई जैसी हरी खाद के उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि फसल चक्र में दलहनी फसलों को शामिल करने से मिट्टी में नाइट्रोजन का प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। विशेषज्ञों के अनुसार नाइट्रोजन की कमी से पौधों का विकास रुक जाता है, पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, पौधे कमजोर हो जाते हैं और पैदावार में भारी गिरावट आती है। ऐसे में समय रहते संतुलित पोषण और जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाना किसानों और कृषि दोनों के हित में आवश्यक है।
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