
हाथरस 16 सितम्बर। ₹2,000 से अधिक के व्यापारी UPI भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) लगाए जाने की व्यवस्था को लेकर संयुक्त उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार मंडल ने आपत्ति जताई है। व्यापार मंडल के पदाधिकारियों ने बैठक कर इस प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं और सरकार तथा आरबीआई से इसे वापस लेने की मांग की। व्यापार मंडल के पदाधिकारियों का कहना है कि छोटे और मध्यम खुदरा व्यापारी पहले से ही टैक्स, दुकान का किराया, बिजली बिल, कर्मचारियों के वेतन और बढ़ती लागत जैसी विभिन्न आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में डिजिटल भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क लगने से व्यापारियों की लागत बढ़ सकती है। बैठक में व्यापार मंडल के संस्थापक राजीव वार्ष्णेय, विपिन वार्ष्णेय और कन्हैया वार्ष्णेय ने कहा कि व्यापारियों पर लगातार अलग-अलग प्रकार के खर्च बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के बाद अब उसी माध्यम से भुगतान प्राप्त करने पर शुल्क लगाया जाना व्यापारियों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ है। जिला अध्यक्ष जयपाल सिंह चौहान ने कहा कि व्यापारी ग्राहकों से कर वसूलकर सरकार के खजाने में जमा करते हैं। ऐसे में अपनी बिक्री का भुगतान प्राप्त करने की लागत भी व्यापारी पर डालना उचित नहीं है। उन्होंने UPI भुगतान पर MDR की व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की मांग की।
जिला वरिष्ठ उपाध्यक्ष नीरज वार्ष्णेय ने बैंकिंग सेवाओं से जुड़े विभिन्न शुल्कों का उल्लेख करते हुए कहा कि 0.4 प्रतिशत की दर छोटी दिखाई दे सकती है, लेकिन लगातार कारोबार पर लागू होने से यह व्यापारियों की लागत को प्रभावित कर सकती है। व्यापार मंडल ने कम मार्जिन पर कारोबार करने वाले खुदरा व्यापारियों, छोटे दुकानदारों और महिला कारोबारियों पर अतिरिक्त शुल्क के संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई। पदाधिकारियों का कहना है कि भुगतान संबंधी अतिरिक्त लागत बढ़ने से व्यापार संचालन पर दबाव पड़ सकता है और इसका असर बाजार की लागत पर भी पड़ सकता है। व्यापार मंडल ने सरकार और आरबीआई से मांग की कि ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान पर MDR लागू करने की व्यवस्था को वापस लिया जाए। संगठन ने छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए निर्धारित टर्नओवर सीमा तक UPI भुगतान को शुल्क-मुक्त रखने की मांग भी की। बैठक के अंत में पदाधिकारियों ने कहा कि व्यापार मंडल डिजिटल भुगतान के पक्ष में है, लेकिन व्यापारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने वाली व्यवस्था को लेकर संगठन अपनी आपत्ति दर्ज कराता रहेगा।








