हाथरस 10 अगस्त। हाथरस में सिपाही चंद्र पहलवान जूस वालों के नाम से मशहूर थे। वह सिर्फ अखाड़े के पहलवान नहीं थे, बल्कि पतंगबाजी के भी ऐसे शौकीन थे कि अपनी दुकान तक छोड़कर पतंग उड़ाने निकल जाया करते थे। 1970 और 1980 के दशक में उन्होंने हाथरस ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और मंडलों में खूब कुश्तियां लड़ीं और कई मुकाबलों में जीत हासिल कर अपनी अलग पहचान बनाई। काली माता के नाम से संचालित अखाड़ा काली पलटन की ओर से वह कुश्ती लड़ा करते थे। उनके दांव-पेंच और पहलवानी का उस दौर में खासा नाम था। सिपाही चंद्र पहलवान को कुश्ती के अलावा पतंगबाजी का भी जबरदस्त शौक था। हाथरस से निकलकर उन्होंने दिल्ली, जयपुर, हरियाणा और मध्य प्रदेश में आयोजित कई पतंगबाजी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। वर्ष 1980 में दिल्ली और जयपुर में आयोजित ऑल इंडिया काइट टूर्नामेंट में भी उन्होंने प्रतिभाग किया और चांदी की पतंग जीतकर हाथरस का नाम रोशन किया। पहलवानी और पतंगबाजी के साथ-साथ वह सामाजिक कार्यों में भी आगे रहते थे। उनका स्वभाव मिलनसार और साफ दिल का बताया जाता है। स्वस्थ रहने के दौरान वह चिंताहरण महादेव मंदिर में प्रतिदिन भगवान महादेव की पूजा-अर्चना करने जाते थे। जीवन के अंतिम समय में भी उनकी आस्था भगवान के प्रति बनी रही और श्रावण मास के पहले सोमवार को राम-राम कहते हुए उन्होंने अंतिम सांस ली।
सिपाही चंद्र पहलवान दो बहनों और 11 भाइयों के परिवार में थे। अब उनकी बहन सरला, जो बरेली में रहती हैं, और भाई गिर्राज किशोर ही जीवित बताए जाते हैं। परिवार के अन्य भाई-बहनों का निधन हो चुका है। उनका करीब 400 लोगों का विस्तृत खानदान बताया जाता है, लेकिन इस बड़े परिवार के बीच सिपाही चंद्र अपनी अलग पहचान छोड़ गए। उनके बड़े भाई गिर्राज किशोर पहलवान उन्हें याद करते हुए कहते हैं, “जीवन में कोई नाम कमाता है, तो कोई दाम कमाता है।” गिर्राज किशोर बताते हैं कि सिपाही चंद्र उनके साथ जूस की दुकान पर बैठा करते थे, लेकिन पतंगबाजी का ऐसा शौक था कि मौका मिलते ही दुकान छोड़कर पतंग उड़ाने चले जाते थे। कई बार उन्हें गोदाम से दुकान के लिए सामान लाने भेजा जाता, लेकिन बाद में पता चलता कि वह सामान लेने के बजाय पतंग उड़ाने पहुंच गए हैं। गिर्राज किशोर बताते हैं कि सिपाही चंद्र का मन बहुत साफ था। जूस की दुकान पर कोई पैसे वाला आता तो जूस पीता था और जिसके पास पैसे नहीं होते, उसे भी वह जूस पिला देते थे। बलदेव छठ और दाऊजी मेले के दौरान जब दूर-दूर से पहलवान हाथरस आते थे और दुकान के सामने से गुजरते थे, तो सिपाही चंद्र उन्हें भी बिना पैसे लिए जूस पिला दिया करते थे। उनके लिए कमाई से ज्यादा लोगों का प्यार और सम्मान मायने रखता था। भाई गिर्राज किशोर की बातों में सिपाही चंद्र के जीवन का सार साफ दिखाई देता है—“वही समय था जब हमने दाम कमाया और उसने नाम कमाया।” आज जब सिपाही चंद्र पहलवान इस दुनिया में नहीं हैं, तब उनके चाहने वाले उन्हें उनकी पहलवानी, पतंगबाजी, साफ दिली और लोगों के प्रति अपनत्व के लिए याद कर रहे हैं। अखाड़े में दांव लगाने वाला यह पहलवान और आसमान में पतंग उड़ाने वाला यह पतंगबाज अपने पीछे ऐसी यादें छोड़ गया है, जिन्हें हाथरस के लोग लंबे समय तक नहीं भूल पाएंगे।







