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हाथरस 14 जून । खरीफ सीजन में धान की खेती करने वाले किसानों के लिए नर्सरी प्रबंधन एवं बीजोपचार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार धान की अच्छी पैदावार की नींव गुणवत्तापूर्ण बीज, वैज्ञानिक बीजोपचार और सही समय पर रोपाई में निहित होती है। विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि वे अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुरूप उन्नत एवं प्रमाणित किस्मों का चयन करें। बीज खरीदते समय यह सुनिश्चित करें कि बीज पूरी तरह परिपक्व, साफ-सुथरे तथा उच्च अंकुरण क्षमता वाले हों। बीजोपचार के लिए 10 लीटर पानी में 1 किलोग्राम नमक मिलाकर घोल तैयार करें और उसमें बीज डालें। ऊपर तैरने वाले हल्के बीजों को निकालकर अलग कर दें। इसके बाद बीजों को साफ पानी से धोकर फफूंदजनित रोगों से बचाव हेतु कार्बेन्डाजिम और स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के घोल में 24 घंटे तक भिगोकर उपचारित करें। जैविक विकल्प के रूप में स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस का भी प्रयोग किया जा सकता है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार धान की नर्सरी लगाने का सबसे उपयुक्त समय 20 जून तक है, जिससे जुलाई माह में समय पर रोपाई की जा सके। नर्सरी के लिए उपजाऊ एवं खरपतवार रहित भूमि का चयन किया जाना चाहिए, जहां सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था हो। ‘वेट बेड विधि’ को नर्सरी तैयार करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। विशेषज्ञों ने बताया कि हाइब्रिड धान के लिए 25 से 30 किलोग्राम, बासमती किस्मों के लिए 12 से 15 किलोग्राम तथा एसआरआई पद्धति के लिए मात्र 7.5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। जब पौध 20 से 25 दिन की हो जाए और उसमें चार पत्तियां निकल आएं, तब उसे मुख्य खेत में रोपाई के लिए तैयार माना जाता है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि रोपाई से पूर्व खेत की उचित तैयारी एवं जल निकासी व्यवस्था सुनिश्चित करें। सही समय पर रोपाई और संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने से फसल की गुणवत्ता एवं उत्पादन में वृद्धि होती है, साथ ही कीट एवं रोगों के प्रकोप को भी काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। कृषि विभाग ने किसानों से वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर धान की खेती करने की अपील की है, जिससे उत्पादन लागत कम होने के साथ-साथ बेहतर उपज प्राप्त की जा सके।

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