
नई दिल्ली 20 फरवरी। अमेरिकी टैरिफ को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। United States Supreme Court ने पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump की ओर से लगाए गए व्यापक आयात शुल्क (टैरिफ) को गैरकानूनी करार दे दिया है। ये वही टैरिफ थे जिनके जरिए ट्रंप प्रशासन ने दोस्त-दुश्मन की परवाह किए बिना कई देशों पर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश की थी। इस नीति की मार India को भी झेलनी पड़ी थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में हलचल तेज हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन टैरिफ से नुकसान उठाने वाले भारतीय निर्यातकों को कोई राहत या रिफंड मिलेगा?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है?
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6–3 के बहुमत से यह फैसला सुनाया कि ट्रंप प्रशासन ने अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (IEEPA) का इस्तेमाल करते हुए अपनी कानूनी सीमा का उल्लंघन किया। अदालत के अनुसार, राष्ट्रपति को इस कानून के तहत इतने व्यापक और सामान्य आयात शुल्क लगाने का अधिकार नहीं था। यह फैसला IEEPA के अंतर्गत लगाए गए सभी व्यापक टैरिफ पर लागू होगा—जिसमें भारत पर लगाया गया अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है।
ट्रंप टैरिफ का पूरा खेल समझिए
ट्रंप प्रशासन ने “राष्ट्रीय आपातकाल” का हवाला देते हुए कई देशों पर पारस्परिक (रिसिप्रोकल) टैरिफ लगाए थे।
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2 अप्रैल 2025 को घोषित इन टैरिफ में भारत भी शामिल था।
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रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर भारत पर प्रभावी टैरिफ दर 50% तक पहुंच गई थी, जो किसी भी देश के लिए सबसे अधिक मानी गई।
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बाद में जनवरी 2026 में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद इस दर को घटाकर 18% किया गया, लेकिन तब तक भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
टैरिफ नीति पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि IEEPA के तहत राष्ट्रपति को इस तरह के व्यापक आयात शुल्क लगाने का अधिकार नहीं था। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट नहीं किया कि अब तक वसूले गए अरबों डॉलर के टैरिफ वापस किए जाएंगे या नहीं। इस मामले में न्यायाधीश ब्रेट कावानॉ ने अपने असहमति नोट में कहा कि यदि सरकार को पैसा लौटाना पड़ा, तो रिफंड की प्रक्रिया बेहद जटिल और उलझी हुई हो सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि रिफंड किसे और कैसे मिलेगा।
क्या भारतीय निर्यातकों को मिलेगा रिफंड?
विशेषज्ञों की राय में भारतीय निर्यातकों को सीधे तौर पर रिफंड मिलने की संभावना बेहद कम है। इसकी वजह यह है कि टैरिफ भारतीय निर्यातकों ने नहीं, बल्कि अमेरिकी आयातकों ने अमेरिकी सरकार को चुकाया था। अमेरिकी कंपनियां जब भारत से सामान मंगाती हैं, तो वही अमेरिकी कस्टम विभाग को शुल्क देती हैं। बाद में यह अतिरिक्त लागत अमेरिकी उपभोक्ताओं से वसूली जाती है।इसलिए अगर रिफंड की प्रक्रिया शुरू भी होती है, तो उसका लाभ अमेरिकी आयातकों को मिलेगा, न कि भारतीय निर्यातकों को।
कुछ कंपनियां पहले ही मांग चुकी हैं रिफंड
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कुछ अमेरिकी कंपनियां—जिनमें खुदरा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी Costco भी शामिल है—अदालत में रिफंड की मांग कर चुकी हैं। हालांकि व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि रिफंड का रास्ता लंबी कानूनी लड़ाई से होकर जाएगा और इसमें कई साल लग सकते हैं।
भारतीय निर्यातकों पर वास्तविक असर
भले ही टैरिफ अमेरिकी आयातकों ने चुकाया हो, लेकिन इसका सीधा नुकसान भारतीय निर्यातकों को हुआ—
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भारतीय उत्पाद अमेरिका में महंगे हो गए
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प्रतिस्पर्धा क्षमता घटी
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फार्मा, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग गुड्स और केमिकल्स जैसे सेक्टरों में ऑर्डर घटे
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कई कंपनियों को कीमतें घटाने का दबाव झेलना पड़ा
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, टैरिफ को अवैध घोषित किए जाने के बावजूद इस अवधि में हुए नुकसान की भरपाई के लिए अमेरिका में फिलहाल कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर असर
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के लिए सकारात्मक हो सकता है। अतिरिक्त 18% टैरिफ हटने से भारत के करीब 55% निर्यात फिर से सामान्य MFN दरों के तहत आ सकते हैं। इससे भारत को चल रही व्यापार वार्ताओं में मजबूत स्थिति मिल सकती है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भी ऊंचे टैरिफ के कारण महंगाई और विकास पर दबाव देखा गया था, ऐसे में यह फैसला वहां के लिए भी राहत भरा माना जा रहा है।
आगे की संभावनाएं
अब पूरा मामला इस पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी सरकार और निचली अदालतें रिफंड को लेकर क्या रुख अपनाती हैं। यदि रिफंड का रास्ता खुलता है, तो अमेरिकी आयातकों को कस्टम प्रक्रिया और अदालतों के जरिए दावा करना होगा। भारतीय निर्यातकों के लिए यह फैसला तुरंत आर्थिक राहत नहीं, लेकिन भविष्य में अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा बहाल होने की उम्मीद जरूर जगाता है।













