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मथुरा 05 जनवरी । एक भयानक दुर्घटना में छाता (मथुरा) निवासी प्रवेश कुमार (31) का सब कुछ बदल गया। दुर्घटना में उसके सिर का बड़ा हिस्सा टूट चुका था, दिमाग पूरी तरह असुरक्षित था तथा उसकी जिन्दगी हर सेकेंड खतरे में थी। ऐसे में उसके लिए के.डी. मेडिकल कॉलेज-हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेण्टर के विशेषज्ञ न्यूरो सर्जन डॉ. दीपक चौधरी और डॉ. राहुल एम. ढोले भगवान साबित हुए। इन चिकित्सकों ने साढ़े तीन घंटे के अथक प्रयासों के बाद प्रवेश के गल चुके सिर के बड़े हिस्से को हटाया तथा टाइटेनियम इम्प्लांट के माध्यम से उसे नया जीवन दिया। जानकारी के अनुसार एक साल पहले छाता (मथुरा) निवासी प्रवेश कुमार (31) पुत्र भगवत गम्भीर दुर्घटना का शिकार हो गया था। सिर में आई गम्भीर चोटों से उसकी हालत नाजुक थी ऐसे समय में डॉक्टरों ने सर्जरी के माध्यम से उसके टूटे सिर की हड्डी को पुनः बिठा दिया लेकिन एक साल बीतने के बाद सिर की हड्डी गल गई। हड्डी गलने से प्रवेश के सिर में एक तरफ गड्ढा हो गया तथा उसके शरीर के बाएं हिस्से में कमजोरी आ गई। बाएं तरफ के हाथ-पैर ने काम करना बंद कर दिया तथा उसके बोलचाल और याददाश्त में भी बदलाव आ गया। मरीज की गम्भीर स्थिति को देखते हुए उसे के.डी. हॉस्पिटल लाया गया जहां न्यूरो सर्जन डॉ. दीपक चौधरी और डॉ. राहुल एम. ढोले ने देखा और परिजनों को ऑपरेशन की सलाह दी। परिजनों की स्वीकृति के बाद न्यूरो सर्जनों ने ऑपरेशन के माध्यम से पहले तो मरीज के गले हुए सिर के हिस्से को हटाया उसके बाद टाइटेनियम इम्प्लांट के माध्यम से उसे खतरे से बाहर लाने में सफलता हासिल की। सर्जरी लगभग साढ़े तीन घंटे चली। इस सर्जरी में डॉ. दीपक चौधरी और डॉ. राहुल एम. ढोले का सहयोग निश्चेतना विशेषज्ञ डॉ. दिव्या, डॉ. श्रुति भारद्वाज, डॉ. रोहित सिंह, डॉ. कार्तिक यादव, डॉ. सूरज सागर सिंह तथा टेक्नीशियन राजवीर, संदीप ठाकुर एवं देवेन्द्र प्रताप सिंह ने किया। न्यूरो सर्जन डॉ. राहुल एम. ढोले ने बताया कि सर्जरी बहुत मुश्किल थी। मेडिकल भाषा में कहें तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसे केस बहुत ही दुर्लभ होते हैं और इसमें जरा-सी गलती जानलेवा साबित हो जाती है। डॉ. ढोले ने बताया कि ऐसे केसों में टाइटेनियम इम्प्लांट ही सबसे कारगर उपाय है। टाइटेनियम मजबूत होता है,  हल्का होता है और शरीर इसे आसानी से स्वीकार कर लेता है। डॉ. दीपक चौधरी ने बताया कि सर्जरी के बाद मरीज धीरे-धीरे होश में आया। उसकी हालत स्थिर होने लगी। कुछ समय बाद वह खुद से बात करने लगा, प्रतिक्रिया देने लगा और सामान्य गतिविधियों की ओर लौटने लगा। डॉक्टरों के मुताबिक, अगर यह तकनीक समय पर इस्तेमाल न की जाती, तो उसका बच पाना असम्भव था। अब प्रवेश कुमार पूरी तरह से स्वस्थ है तथा एक नई जिन्दगी जी रहा है, ऐसी जिन्दगी, जो मेडिकल साइंस, टेक्नोलॉजी और इंसानी हौसले की जीत का सबूत है। के.डी. मेडिकल कॉलेज-हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेण्टर के चेयरमैन मनोज अग्रवाल, डीन और प्राचार्य डॉ. आर.के. अशोका, चिकित्सा निदेशक डॉ. गगनदीप सिंह आदि ने सफल सर्जरी के लिए डॉ. दीपक चौधरी, डॉ. राहुल एम. ढोले तथा उनकी टीम को बधाई देते हुए मरीज के स्वस्थ-सुखद जीवन की कामना की।

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