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सासनी 08 अप्रैल । निनामाई में चल रही भागवत कथा के दू‌सरे दिन कथा व्यास आचार्य चंद्रेश जी महाराज ने भागवत के श्लोकों और महाभारत के संस्मरणों के माध्यम से जीवन के मूलभूत सिद्धांतों का वर्णन करते हुए कहा कि दान की महिमा का वर्णन किया नहीं जा सकता उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने द्वारा अर्जित धन का कम से कम दसवां हिस्सा दान अवश्य करना चाहिए। यह दान केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि आत्म शुद्धि और समाज कल्याण का मार्ग भी है। दान व्यक्ति को सांसारिक आसक्ति से ऊपर उठाकर परोपकार और संतोष की ओर प्रेरित करता है। कथा के मध्य उन्होंने भीष्म पितामह के जीवन प्रसंगों का स्मरण कराया और बताया कि मृत्यु शैय्या पर उन्होंने अपने परिवार और समाज को उपदेश दिया था कि राजा का प्रथम कर्तव्य है कि वह प्रजा का पालन पुत्रवत करे, न्याय और धर्म को सर्वोपरि रखे और अंत में प्रभु भक्ति के बल पर मोक्ष को प्राप्त करे। श्रीकृष्ण के समक्ष भीष्म का देहावसान त्याग, तप, क्षमा और दया का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि अंत समय में भीष्म अपने कर्मों का चिंतन करते हुए स्वयं को दोषमुक्त नहीं मानते, लेकिन भक्ति, सत्य और समर्पण के बल पर कृष्ण के सम्मुख उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मौके पर आचार्य की भूमिका अंकित द्विवेदी ने निभाई। परीक्षित भगवान की भूमिका सुरेश चंद कौशिक एवं उनकी धर्मपत्नी निर्मला देवी ने निभाई। इस मौके पर अनुपम कौशिक, राजीव कौशिक, भावेश कौशिक, मिनाल उपाध्याय, अनिल कौशिक, प्रभा कौशिक, यदुवेद कौशिक, भूरा मास्टर, अनिल शर्मा, एवं समस्त ग्रामीण मौजूद रहे।

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