
नई दिल्ली 17 मार्च । समाजवादी पार्टी के सांसद रामजीलाल सुमन ने राज्यसभा में अनुदानों की अनुपूरक मांगों पर चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि विभिन्न मदों के साथ सरकार ने मध्य-पूर्व में हो रहे युद्ध को देखते हुए आर्थिक स्थिरता फंड बनाए जाने का उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि वे तो जानते थे कि यह सरकार गूंगी और बहरी है लेकिन वे आश्वस्त हैं कि यह सरकार अंधी भी है, पूरे देश में गैस के सिलेंडर के लिए लाइनें लगी हैं, सिलेंडर के दाम पांच गुना तक बढ़ गये हैं, स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जनपद में गैस पर आधारित कांच की 120 औद्योगिक इकाइयों में से 90 कारखाने बंद हो गए हैं। फर्रुखाबाद जनपद में मुख्तार अंसारी और पंजाब के बरनाला में भूषण कुमार नामक व्यक्तियों की मौत गैस सिलेंडर के लिए लंबे समय तक लाइन में लगने के कारण हृदय गति रुकने से हो गई। उन्होंने कहा कि अभी हाल में भाजपा के एक सांसद ने इसी सदन में समाजवादी पार्टी पर गैस जमाखोरी का आरोप लगाया है, ये वास्तविकता से कोसों दूर है, स्थिति पर नियंत्रण की पूरी जिम्मेदारी सरकार की है। मुझे विवश होकर कहना पड़ रहा है कि इस देश में मुनाफाखोरों और जमाखोरों की पार्टी यदि कोई है तो वह सिर्फ भाजपा है।
श्री सुमन ने कहा कि किसानों के हितों के संरक्षण के लिए वित्त मंत्री ने 19 हजार 230 करोड़ रुपए की व्यवस्था की है। 2020-21 में इस देश में किसान आंदोलन हुआ, लगभग 750 किसान शहीद हुए, लाखों किसानों के खिलाफ मुकदमें पंजीकृत हुए, न तो सरकार ने किसानों के मुकदमें वापिस लिये और न ही मृतक किसानों को शहीदी का दर्जा दिया गया और न ही कोई मुआवजा दिया। किसान आंदोलन के दबाव में प्रधानमंत्री ने 12 जुलाई 2022 को किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने के लिए एक कमेटी का गठन किया। यह सरकार किसान विरोधी सरकार है, एक साल से इस कमेटी की कोई बैठक नहीं हुई है, सरकार विभिन्न फसलों का जो न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती उससे ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल ये है कि किसान को उसका लाभ मिलता है कि नहीं मिलता। भारत सरकार ने स्वयं भाजपा के वरिष्ठ नेता शांता कुमार की अध्यक्षता में न्यूनतम समर्थन मूल्य के संबंध में एक कमेटी गठित की थी। शांता कुमार कमेटी ने ये निष्कर्ष निकाला था कि देश में सिर्फ 6 प्रतिशत किसानों को ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का लाभ मिलता है। यह सरकार किसानों के परिश्रम के साथ मजाक कर रही है।
श्री सुमन ने कहा कि आज आलू किसान अत्यधिक संकट में है, 2020 में जब आलू और प्याज के दाम बढ़ गए थे तो सरकार ने उनको नियंत्रित करने के लिए विशेष प्रयास किये थे, आज जब आलू किसान संकट में है और उसका आलू कौड़ी के भाव बिक रहा है तो सरकार आलू किसान को संकट से मुक्ति दिलाने हेतु विशेष प्रयास क्यों नहीं कर रही है। मजेदार बात ये है कि आलू बागवानी की श्रेणी में आता है न कि खाद्य पदार्थ की श्रेणी में, ये कितनी अफसोस की बात है कि आज किसानों को आलू का भाव 2-3 रुपए प्रति किलो मिल रहा है जबकि आलू उपभोक्ता 15-20 रुपए प्रति किलो आलू खरीदता है, आखिर ये लाभ किसको हो रहा है। आलू की उत्पादन लागत 1200 रुपया प्रति कुंतल है, 2018 में उत्तर प्रदेश ने मजाक किया कि वह 490 रुपया प्रति कुंतल की दर से आलू खरीदेगी, इससे ज्यादा मजाक और क्या हो सकता है। सरकार आलू किसानों के लिए नीति निर्धारित करे और आलू खरीद का उचित समर्थन मूल्य तय करे, यदि सरकार कोई सार्थक पहल नहीं करती है तो आलू किसानों की आह इस सरकार को नेस्तोनाबूत कर देगी।


























