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हाथरस 25 जनवरी । भारत में सामाजिक समानता स्थापित करने के लिए अनुसूचित जाति–जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को एक सुरक्षा कवच के रूप में बनाया गया था। परंतु समय के साथ इस कानून का दुरुपयोग इसे और भी जटिल बना गया है। इस दुरुपयोग में सबसे अधिक भूमिका राजनीतिक पार्टियों की रही है। कानून के बनने के साथ ही राजनीतिक दलों ने इसे तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, जो आज तक जारी है। सत्ता में कोई भी पार्टी रही हो, इस तुरुप के पत्ते का भरपूर लाभ उठाती रही है। यदि यह कानून न होता, तो संभव है कि आज भारत में सभी नागरिक भाईचारे से रहते और जातिवाद या तो समाप्त हो चुका होता या समाप्ति के कगार पर होता। जहां तक योग्यता और आरक्षण का प्रश्न है, जन्म से कोई व्यक्ति योग्य या अयोग्य नहीं होता। साधनहीनता ही व्यक्ति को अयोग्य बनाती है। ऐसे में साधनहीन परिवारों की सहायता करना और उन्हें आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना समाज और सरकार—दोनों की जिम्मेदारी है। साधनहीन लोगों को सरकार द्वारा आरक्षण नहीं, संरक्षण मिलना चाहिए। परंतु समाज में विषमता को बढ़ावा देने वाले आरक्षण को लगातार बढ़ाकर सरकारें अपने राजनीतिक हित साध रही हैं। इससे एक वर्ग को मेहनत से वंचित कर स्थायी रूप से आश्रित बनाया जा रहा है। एक ओर सवर्ण वर्ग निरंतर मेहनत करके योग्यता के शिखर तक पहुंच रहा है, जबकि दूसरी ओर पिछड़े वर्ग के लोग आरक्षण की बैसाखियों पर निर्भर रहकर कृपा पात्र बनकर अपमान सहन कर रहे हैं। समान अधिकार और सम्मान पाना है तो इन बैसाखियों से हटना पड़ेगा और समाज की समान व्यवस्था स्वीकार करनी होगी।

गलत नीतियों के कारण ऊँच-नीच की यह दरार अब खाई बनने की स्थिति में है। सरकार की यह सोच कि भेदभाव को ऊपर से समाप्त किया जा सकता है, हास्यास्पद है। क्योंकि ऊँच-नीच का भाव नीचे से ऊपर पहुंचता है; कभी ऊपर से नीचे नहीं आता। यह नीचे से ऊपर तक पहुंचकर स्थायी हो जाता है। अतः यूजीसी में भेदभाव समाप्त करने के नाम पर जो योजना बनाई जा रही है, वह अविवेकी है। यूजीसी में इस प्रकार के आरक्षण से मानसिक और व्यवहारिक दोष उत्पन्न होंगे। अब केवल वाद-विवाद नहीं, बल्कि बड़ी घटनाएं सामने आएंगी—अपराध बढ़ेंगे और सामाजिक ढांचा छिन्न-भिन्न होगा। अतः उच्चतम न्यायालय से प्रार्थना है कि वे सामाजिक ढांचे की रक्षा हेतु इसमें हस्तक्षेप करें और समाज को विघटन की दिशा में जाने से बचाएं।

— डॉ. कुसुम, सनातनी, समाज विचारक

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