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हाथरस 08 जनवरी । जिला कृषि रक्षा अधिकारी निखिल देव तिवारी ने अवगत कराया है कि रमेश चन्द्र वर्मा वरिष्ठ प्राविधिक सहायक ग्रुप-बी कृषि रक्षा ने मुरसान विकास खण्ड के गाँव विशुनदास, भगतुआ, गारवगढी, नगला हीरा सिंह, माह का नगला आदि में कीट और रोग सर्वेक्षण किया गया। मौसम में अचानक आये बदलाव को देखते हुये जनपद के सरसों उत्पादक किसानों को सलाह दी जाती है कि जिस तरह का मौसम पिछले दो तीन दिन से चल रहा है उसमें सरसो और आलू की फसल पर बीमारियों का प्रकोप होने की सम्भावना बहुत बड़ गयी है। यदि इस तरह का मौसम कुछ दिनों रहता है तो सरसों की फसल में तना सड़न, अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा, सफेद गेरूई और तुलासिया एवं माहूँ कीट और आलू की फसल में तना सड़न, पछेती झुलसा के प्रकोप की सम्भावना बहुत अधिक रहेगी। जिन किसान भाइयों ने सरसों और आलू के बीज को बीज शोधन दवाई से शोधन कर नहीं बोया है उन खेतों में प्रकोप अधिक मात्रा में दिखाई देगा, अधिक प्रकोप की दशा में पूरी फसल में अधिक क्षति होने की सम्भावना है।

सरसों और आलू की फसल में बीमारी के निम्न प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ने से पहले ही रसायन का छिड़काव करे।

  • सरसो की फसल- तना सड़न- इस बीमारी के लक्षण पौधों के तनों पर उस भाग पर दिखाई देते हैं जो भाग भूमि के सम्पर्क में रहता है वहाँ पर सबसे पहले प्रकोप होता है तना काला होकर सड़ जाता है। तने के आगे का भाग नष्ट हो जाता है प्रकोपित खेतों से दुर्गन्ध आती है।
  • अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा- इस बीमारी में पत्तियों और फलियों पर गहरे कत्थई रंग के धब्बे बनते है जो गोल छल्ले के रूप में पत्तियों पर स्पष्ट दिखाई देते है। तीव्र प्रकोप की दशा में धब्बे आपस में मिल जाते है जिससे पूरी पत्ती झुलस जाती है।
  • सफेद गेरूई- इस बीमारी में पत्तियों की निचली स्तह पर सफेद फफोले बनते है जिससे पत्तियों पीली होकर सूखने लगती है। फूल आने की अवस्था में पुष्कम विकृत हो जाता है. जिससे कोई भी फली नहीं बनती है।
  • तुलासिता- इस बीमारी में पुरानी पत्तियों की ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे धब्बे तथा पत्तियों की निचली सतह पर इन धब्बों के नीचे सफेद रोयेदार फफूंदी उग जाती है। धीरे-धीरे पूरी पत्ती पीली होकर सूख जाती है।
  • माहूँ- इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ पीलापन लिए हुए हरे रंग के होते हैं। जो पौधों के कोमल तनों पत्तियों, फूलों एवं नई फलियों का रस चूसकर कमजोर कर देते है। माहूँ मधुस्राव करते है। जिसपर काली फफूंद उग आती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण में बाधा उत्पन्न होती है।

बचाव हेतु उपचार – बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर तना सड़न, अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा, सफेद गेरूई और तुलासिता बीमारी के नियंत्रण के लिए मैकोजेब 75 प्रतिशत डब्लूपी की 2.0 किग्रा अथवा जिनेब 75 प्रतिशत डब्लूपी की 20 किग्रा अथवा कापर ऑक्सी क्लोराइड 50 प्रतिशत डब्लू० पी० की 3.0 किग्रा मात्रा को प्रति हैक्टेयर 600-750 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

  • माहूँ कीट से बचाव हेतु डाईमेथोएट 3० प्रतिशत ईसी अथवा क्लोरोपाइरीफॉस 20 प्रतिशत ई०सी० की 10 लीटर मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से 600-750 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें। एजाडिरेक्टिन नीम का तेल ०.15 प्रतिशत ई०सी० 205 लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से भी प्रयोग कर सकते है।
  • आलू की फसल- तना सड़न- इस बीमारी के लक्षण पौधो के तनों पर उस भाग पर दिखाई देते है जो भाग भूमि के सम्पर्क में रहता है। वहाँ पर सबसे पहले प्रकोप होता है तना काला होकर सड़ जाता है, तने के आगे का भाग नष्ट हो जाता है, प्रकोपित खेतों से दुर्गन्ध आती है।
  • पछेती झुलसा- इस बीमारी के लक्षण पहले पत्तियों, डंठलो, कन्दों और तनों पर लगता है। इस बीमारी के प्रारम्भिक लक्षण पत्तियों पर छोटे हल्के पीले, हरे अनियमित आकार के धब्बों के रूप में दिखाई देते है जो शीघ्र ही बढ़कर बड़े नीले दिखाई वाले धब्बे बनाते है या भूरे बैगनी धब्बे दिखाई देते है बाद में पत्तियों के निचले भाग पर इन धब्बों के चारों और अंगूठीनुमा सफेद फफूंदी आ जाती है। रोकथाम में देर होने पर यह फफूंद कन्द तक पहुँच जाता है और सड़न पैदा कर देती है। अधिक प्रकोप होने पर पूरा पौधा झुलस जाता है।

बचाव हेतु उपचार – बीमारी के लिए अनुकूल मौसम होने पर सिंचाई बन्द कर दें तथा 75 प्रतिशत पत्तियां नष्ट होने पर डण्ठलों को काटकर खेत से बाहर गड्ढे में दबा दें। बीमारी के लक्षण दिखाई देने से पूर्व स्टेप्टोसाइक्लीन और कापर ऑक्सी क्लोराइड या मैकोजेब 75 प्रतिशत (0.5 से 15 ग्राम और से 1.500 किग्रा) या कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत+मैकोजेब 63 प्रतिशत की 1 किलोग्राम मात्रा जहाँ रोग दिखाई देने लगा है वहाँ पर साइमोक्सेनिल 8 प्रतिशत+मैकोजेब 64 प्रतिशत अथवा मेटालेक्सिल 8 प्रतिशत+मैकोजेब 64 प्रतिशत की 1 किलोग्राम मात्रा को 750.1000 लीटर पानी में घोल कर एक हेक्टर में 8 से 10 के अन्तर पर 3 से 4 छिड़काव करें। झुलसा का भयंकर प्रकोप होने पर मेटालेक्सिल युक्त दवाओं के 0.25 प्रतिशत घोल का 1 से 2 छिड़काव करे या टाइकोडर्मा और स्यूडोमोनास जैविक रसायन (दोनो की 1+1 किग्रा मात्रा को) पानी में घोल कर एक एकड़ में छिड़काव करें।

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