
हाथरस 06 जनवरी । चंद्र शेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर के कृषि मौसम तकनीकी अधिकारी अजय मिश्रा द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस वर्ष भारत में कड़ाके की ठंड और लंबे शीतकाल के पीछे कई प्रमुख भौगोलिक और वायुमंडलीय कारण उत्तरदायी हैं। मुख्य रूप से ला नीना के प्रभाव के कारण प्रशांत महासागर की सतह ठंडी होने से वैश्विक पवन पैटर्न बदल गया है, जिससे साइबेरिया और मध्य एशिया की बर्फीली हवाएं निर्बाध रूप से उत्तर भारत के मैदानी इलाकों तक पहुँच रही हैं। इसके साथ ही, पश्चिमी विक्षोभ की बढ़ती तीव्रता पहाड़ों पर भारी बर्फबारी और मैदानों में लंबे समय तक कोहरे व गलन का कारण बन रही है। साथ ही, कमजोर ध्रुवीय भंवर और समताप मंडल में हो रहे बदलावों ने इस ठंड को और अधिक गंभीर बना दिया है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, ला नीना की यह स्थिति मार्च 2026 तक बनी रह सकती है, जिसके परिणामस्वरूप इस बार शीतकाल न केवल अधिक तीव्र होगा, बल्कि सामान्य से अधिक लंबा भी खिंच सकता है।
6 दिनों से धूप गायब, आलू–सरसों और टमाटर पर मंडराया संकट
उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड और लगातार गहराते कोहरे ने आम जनजीवन के साथ-साथ खेती-किसानी की चिंता बढ़ा दी है। जिले में पिछले 6 दिनों से सूर्य देव के दर्शन नहीं हुए हैं, जिसके चलते फसलों पर ‘झुलसा रोग’ और कीटों का खतरा पैदा हो गया है। कृषि विज्ञान केंद्र, हाथरस के वैज्ञानिक डॉ. बलवीर सिंह ने किसानों को विशेष रूप से सतर्क रहने की चेतावनी देते हुए बताया कि धूप न निकलने और हवा में नमी बढ़ने के कारण सरसों, आलू और टमाटर की फसलों को सबसे अधिक नुकसान पहुँच सकता है। उनके अनुसार, आलू और टमाटर की फसल में ‘पछेती झुलसा’ रोग लगने की प्रबल संभावना है, जिसके मुख्य लक्षण पत्तियों पर काले-भूरे धब्बे दिखना है। इसके साथ ही, सरसों की फसल में ‘लाही’ (एफिड) कीट और ‘सफेद रतुआ’ का प्रकोप बढ़ने की भी आशंका है, जिससे किसान भाइयों को अपनी फसलों की सुरक्षा के प्रति विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
वैज्ञानिक की अपील
“मौसम का यह मिजाज रबी की फसलों के लिए अग्निपरीक्षा जैसा है। किसान भाई लापरवाही न बरतें। समय रहते उचित रसायनों और पारंपरिक तरीकों (धुआं व सिंचाई) का उपयोग कर अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित करें।” — डॉ. बलवीर सिंह, कृषि वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र हाथरस




















