
नई दिल्ली 02 जनवरी । सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पति-पत्नी के आर्थिक मामलों पर अहम टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि पति का पत्नी पर आर्थिक या वित्तीय प्रभुत्व अपने आप में क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने कहा कि आपराधिक मुकदमेबाजी को निजी बदले या हिसाब चुकता करने का जरिया नहीं बनने दिया जा सकता। यह टिप्पणी उस मामले में आई है जिसमें पति के खिलाफ क्रूरता और दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज किया गया था। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने पति की अपील स्वीकार करते हुए एफआईआर रद्द कर दी। इससे पहले तेलंगाना हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार किया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि लगाए गए आरोप कानूनी कसौटी पर खरे नहीं उतरते। पीठ ने कहा कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों में पति का आर्थिक प्रभुत्व बताया गया है, लेकिन इससे किसी ठोस मानसिक या शारीरिक नुकसान का प्रमाण नहीं मिलता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल वित्तीय मामलों में नियंत्रण रखने के कारण आपराधिक क्रूरता का मामला नहीं बनता। खर्च का हिसाब मांगना या पैसों के उपयोग की जानकारी लेना अपने आप में क्रूरता नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच खर्चों को लेकर विवाद या तकरार विवाह के दैनिक उतार-चढ़ाव का हिस्सा हो सकता है। ऐसे मामलों को भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता। अदालत ने चेतावनी दी कि वैवाहिक मामलों में आरोपों की गहन जांच जरूरी है, ताकि कानून का दुरुपयोग न हो और न्याय का हनन न हो। अदालत ने कहा कि पति पर लगाए गए क्रूरता, मानसिक उत्पीड़न और चोट पहुंचाने के आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं और इनमें दुर्भावनापूर्ण मंशा दिखाई देती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले की टिप्पणियां अन्य वैवाहिक या दीवानी मामलों को प्रभावित नहीं करेंगी, जो अपने तथ्यों और कानून के अनुसार अलग-अलग तय किए जाएंगे।


















