
हाथरस 07 सितम्बर। बरसात के मौसम में आज भी अंतिम संस्कार के दौरान लोगों को खुले आसमान के नीचे परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कहीं चिता को बारिश से बचाने के लिए परिजनों और ग्रामीणों को तिरपाल पकड़कर खड़ा होना पड़ता है तो कहीं जलभराव और कीचड़ के बीच अंतिम विदाई दी जाती है। जिले में अलग-अलग गांवों से सामने आई घटनाएं पक्के अंत्येष्टि स्थलों की बदहाल व्यवस्था की तस्वीर सामने ला रही हैं। जिला प्रशासन के जिम्मेदारों के मुताबिक बजट की कमी के कारण जिले में कई ग्राम पंचायतों में अब तक पक्के अंत्येष्टि स्थल नहीं बन सके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांवों में जमीन की कमी नहीं है, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और बजट की धीमी प्रक्रिया के कारण लोगों को आज भी मूलभूत सुविधा के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। ग्रामीण लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि जब तक स्थायी शेड का निर्माण नहीं होता, तब तक प्रत्येक पंचायत में अस्थायी शेड या वाटरप्रूफ टेंट की व्यवस्था की जाए, लेकिन इस मांग पर भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई है। 5 सितंबर को सहपऊ के मांगरू गांव में 55 वर्षीय अनिल की बीमारी के बाद मौत हो गई। अंतिम संस्कार के दौरान तेज बारिश शुरू हो गई। श्मशान स्थल पर पक्का शेड नहीं होने के कारण ग्रामीणों ने बांस-बल्ली के सहारे चादर और तिरपाल तानकर चिता को बारिश से बचाया। लोग काफी देर तक तिरपाल पकड़े खड़े रहे। इसी तरह 8 अगस्त को हाथरस जंक्शन क्षेत्र के रम नगला के धौलाकुआं गांव में होमगार्ड हरी सिंह के अंतिम संस्कार के दौरान भी बारिश ने मुश्किल खड़ी कर दी। पक्का शेड नहीं होने के कारण परिजनों और ग्रामीणों को तिरपाल के सहारे अंतिम संस्कार पूरा करना पड़ा। 30 जुलाई को पवलोई गांव में भी ऐसी ही स्थिति सामने आई। श्मशान स्थल पर बड़ी-बड़ी झाड़ियों और अव्यवस्था के बीच अंतिम संस्कार किया जा रहा था, तभी मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बरौली निवासी वीरेंद्र सिंह के अंतिम संस्कार के दौरान परिजनों को कीचड़ के बीच तिरपाल तानकर खड़ा होना पड़ा। वहीं 10 जुलाई को वार्ड संख्या 16 स्थित सोखना श्मशान घाट पर दो अलग-अलग महिलाओं के अंतिम संस्कार के दौरान लगातार बारिश होती रही। यहां स्थायी शेड और जल निकासी की व्यवस्था न होने से परिजनों को जलभराव और कीचड़ के बीच तिरपाल पकड़कर अंतिम संस्कार करना पड़ा।











