
हाथरस 19 जुलाई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शहर के मेण्डू रोड स्थित फोकस अल्ट्रासाउंड एंड इमेजिंग सेंटर को सील किए जाने की कार्रवाई को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत मानते हुए निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने आदेश दिया है कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के 48 घंटे के भीतर सेंटर की सील खोल दी जाए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अजीत कुमार एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने सेंटर के निदेशक डॉ. विकास कुमार शर्मा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अपने विस्तृत निर्णय में न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता को सेंटर सील किए जाने से पहले प्रभावी सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह सिद्ध हो सके कि कारण बताओ नोटिस विधिवत तामील किया गया था। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि सीलिंग का आदेश 2 जून को पारित किया गया और 3 जून को उसकी प्रति देकर तत्काल सेंटर को सील कर दिया गया। ऐसे में याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर ही नहीं मिल सका, जो प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है।
खंडपीठ ने यह भी संज्ञान लिया कि फोकस अल्ट्रासाउंड एंड इमेजिंग सेंटर का पंजीकरण मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा निरीक्षण के उपरांत वर्ष 2030 तक नवीनीकृत किया जा चुका था। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी प्रकार का उल्लंघन पाया जाता है तो सक्षम प्राधिकारी विधि के अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन बिना उचित सुनवाई के संचालित चिकित्सा संस्थान को सील करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक अपील का प्रभावी उपाय उपलब्ध था, लेकिन न्यायालय ने इस आपत्ति को भी अस्वीकार कर दिया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब मामला प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन से जुड़ा हो, तब संविधान के तहत रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया जा सकता है।
हालांकि, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने भवन निर्माण अथवा अन्य आरोपों के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है। यदि सक्षम प्राधिकारी भविष्य में कोई कार्रवाई करता है, तो उसे याचिकाकर्ता को सभी शिकायतों, निरीक्षण रिपोर्टों एवं अन्य संबंधित दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध करानी होंगी, जवाब दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय देना होगा तथा व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर प्रदान करने के बाद ही विधिसम्मत एवं कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा। उच्च न्यायालय के इस फैसले को प्राकृतिक न्याय, निष्पक्ष प्रशासनिक प्रक्रिया तथा विधि के शासन के सिद्धांतों की पुनः पुष्टि करने वाला एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। यह आदेश स्पष्ट करता है कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में संबंधित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करना न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है।








