हाथरस 30 अप्रैल। आज विश्व एक अत्यंत जटिल दौर से गुजर रहा है, जहाँ पूंजीवादी संकट और अंतरराष्ट्रीय युद्धों (ईरान-अमेरिका-इजरायल) ने वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल दिया है। इस अस्थिरता के बीच भारत में 21 नवंबर 2025 से प्रभावी हुए चार नए श्रम कोड एक गंभीर चिंता का विषय बनकर उभरे हैं। 29 पुराने कानूनों को समाहित करने वाली इन संहिताओं—वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा—पर श्रमिक संगठनों का आरोप है कि ये पूंजीपतियों को मनमानी की छूट देती हैं। काम के घंटों को 8 से बढ़ाकर 12 करने की संभावना और हड़ताल जैसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर पाबंदी लगाने की योजना के कारण इनका राष्ट्रव्यापी विरोध हो रहा है।
मई दिवस का इतिहास बलिदान और अधिकारों की रक्षा की गाथा है। 1886 में शिकागो के हेमार्केट स्क्वायर में 8 घंटे कार्य दिवस की मांग कर रहे मजदूरों पर हुई गोलीबारी ने दुनिया को ‘लाल झंडा’ दिया। भारत में इस परंपरा की नींव 1 मई 1923 को मद्रास में सिंगरावेलू चेट्टियार ने रखी थी। यह डॉ. बी.आर. अंबेडकर का ही दूरदर्शी नेतृत्व था, जिन्होंने 1942 में अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर ‘8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन’ के सिद्धांत को कानूनी मान्यता दिलाई। आज के दौर में जब कार्य दिवस की मर्यादाओं पर पुनः संकट मंडरा रहा है। पूर्व राष्ट्रीय संगठन मंत्री ऑल इंडिया डिफेंस एम्पलाइज फेडरेशन पूने- 3 पूर्व सदस्य-संयुक्त परामर्श दात्री परिषद (ĴCM-D) रक्षा मंत्रालय भारत सरकारडॉ जितेंद्र स्वरुप शर्मा का यह विश्लेषण श्रमिकों के संघर्ष और उनकी गौरवशाली विरासत को अक्षुण्ण रखने की आवश्यकता पर बल देता है।


























