
हाथरस 10 मार्च । आज के आधुनिक युग में जहाँ बेटियाँ और बहुएँ हर क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं, वहीं हाथरस की रजनी त्रिवेदी ने वर्षों पुरानी सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर एक नई मिसाल पेश की है। परिवार में पुत्र, तीन पौत्र और तीन प्रपौत्रों के होने के बावजूद, रजनी ने अपनी सास की न केवल जीवनभर सेवा की, बल्कि उन्हें मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई भी दी। रजनी त्रिवेदी का यह कदम समाज को एक गहरा संदेश देता है कि सच्चा धर्म और संस्कार केवल परंपराओं की सीमाओं में नहीं, बल्कि निस्वार्थ सेवा में निहित हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि यदि एक स्त्री को जीवन भर सेवा का अधिकार है, तो उसे अंतिम विदाई देने का साहस और अधिकार भी प्राप्त है। जब आज की नारी अंतरिक्ष की ऊंचाइयों को छू रही है, ऐसे में केवल पुरुषों को ही दाह संस्कार का अधिकारी मानना एक विचारणीय विषय है।
रजनी त्रिवेदी द्वारा दी गई मुखाग्नि की यह घटना पूरे जनपद में चर्चा का विषय बनी हुई है। उन्होंने समाज के उस नजरिए को चुनौती दी है जो अंतिम संस्कारों को केवल पुरुषों तक सीमित रखता है। उनके इस साहसी निर्णय की सराहना करते हुए प्रबुद्ध वर्ग का कहना है कि संस्कार और कर्तव्य किसी लिंग के मोहताज नहीं होते, बल्कि वे प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा हैं। यह घटना उन लोगों के लिए एक आईना है जो आज भी पुत्र-पुत्री में भेद करते हैं। रजनी ने दिखाया है कि एक बहू, बेटी बनकर न केवल घर को संवार सकती है, बल्कि धर्म की नई और मानवीय व्याख्या भी लिख सकती है।
























