रास नृत्य से हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम का प्रारंभ भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधारानी के मनोहारी स्वरूपों द्वारा बृज गोपियों के साथ किए गए रास नृत्य से हुआ। मधुर भजनों और नूपुरों की ध्वनि से पूरा परिसर वृंदावन के रंग में रंगा नजर आया।
सत्य की परीक्षा और राजा हरिश्चंद्र का त्याग
रासलीला के मुख्य प्रसंग में कलाकारों ने राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा का जीवंत चित्रण किया। दिखाया गया कि किस प्रकार ऋषि विश्वामित्र द्वारा ली गई कठिन परीक्षा में राजा ने अपना संपूर्ण राजपाठ दान कर दिया। सत्य की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं को श्मशान में चांडाल के हाथों बेचा और अपनी पत्नी तारामती व पुत्र रोहिताश्व तक का त्याग कर दिया। पुत्र की मृत्यु के उपरांत श्मशान घाट पर पत्नी से ‘कर’ (टैक्स) मांगने वाले दृश्य को देख पांडाल में मौजूद कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। अंततः उनकी सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें पुनः वैभव और जीवन दान दिया।
सत्य की ही होती है जीत: रासाचार्य
लीला के उपरांत रासाचार्य फतेह कृष्ण शर्मा ने व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि राजा हरिश्चंद्र का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों, मनुष्य को सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा, “सत्य के पथ पर कठिनाइयां अवश्य आती हैं, लेकिन जीत हमेशा सत्य की ही होती है। असत्य के प्रयास कभी सफल नहीं होते।”
आरती के साथ हुआ समापन
लीला के समापन पर भगवान के स्वरूपों की भव्य आरती उतारी गई। ‘जय बांके बिहारी’ के जयकारों से पूरा वातावरण गुंजायमान रहा। इस अवसर पर बड़ी संख्या में क्षेत्रीय ग्रामीण और श्रद्धालु उपस्थित रहे।













