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हाथरस 23 फरवरी । जे.टी.आर.आई. लखनऊ के निर्देशानुसार और जनपद न्यायाधीश श्री विनय कुमार-III की अध्यक्षता में जनपद न्यायालय परिसर के वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कक्ष में एक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण सत्र का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों के लिए ‘सतत सीखने का वातावरण’ (Continuous Learning Environment) निर्मित करना था, ताकि कानूनी प्रक्रियाओं में और अधिक स्पष्टता लाई जा सके।

क्या है धारा 138 एन.आई. एक्ट?

कार्यशाला के मुख्य वक्ता, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री दीपक नाथ सरस्वती ने ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट’ (N.I. Act) की धारा 138 पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यदि कोई व्यक्ति किसी ऋण या दायित्व के भुगतान हेतु चेक जारी करता है और वह बैंक द्वारा ‘अपर्याप्त धनराशि’ (Insufficient Funds) या बैंक समझौते की सीमा से अधिक होने के कारण ‘अवैतनिक’ (Dishonoured) लौटा दिया जाता है, तो यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। उन्होंने इस प्रक्रिया से जुड़ी तकनीकी और कानूनी जटिलताओं पर गहन जानकारी साझा की।

वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों की गरिमामयी उपस्थिति

इस ज्ञानवर्धक सत्र में जनपद के वरिष्ठ और कनिष्ठ न्यायिक अधिकारियों ने सक्रिय सहभागिता की। कार्यक्रम में प्रधान न्यायाधीश (परिवार न्यायालय) बाबू राम, अपर जनपद न्यायाधीश संगीता शर्मा, चित्रा शर्मा, हर्ष अग्रवाल, निर्भय नरायन राय, शैलेन्द्र सिंह, माधवी सिंह और प्रशान्त कुमार उपस्थित रहे। साथ ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जय हिन्द कुमार सिंह, सिविल जज (व.प्र.) आकांक्षा गर्ग, सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण अनु चौधरी, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सादाबाद) आशीष थिरानिया, सिविल जज (व.प्र.) एफ.टी.सी. पूनम चौहान, सिविल जज (क.प्र.) आंचल चन्देल, हर्षिका रस्तोगी और न्यायिक मजिस्ट्रेट खुशबू चंद्रा ने भी विषय पर मंथन किया।

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