
हाथरस 12 फरवरी । प्रदेश सरकार के बजट में एक जनपद–एक व्यंजन योजना के तहत हाथरस को एक करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत होने से स्थानीय उद्यमियों और कारीगरों में उत्साह का माहौल है। इस योजना में हाथरस की प्रसिद्ध रबड़ी का चयन किया गया है। बजट प्रावधान के बाद रबड़ी के उत्पादन, आधुनिक पैकेजिंग और प्रभावी मार्केटिंग को नई दिशा मिलने की संभावना जताई जा रही है। स्थानीय मिठाई कारोबारियों का कहना है कि सरकारी सहयोग से आधुनिक तकनीक के माध्यम से बड़े स्तर पर उत्पादन संभव होगा, साथ ही बेहतर ब्रांडिंग से जिले की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर और सुदृढ़ होगी। इससे छोटे दुकानदारों और कारीगरों को भी सीधा लाभ मिलेगा। उपायुक्त जिला उद्योग केंद्र अजलेश कुमार ने बताया कि योजना के अंतर्गत प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनसे कारीगरों को गुणवत्ता सुधार, स्वच्छता मानकों और आधुनिक उत्पादन तकनीकों की जानकारी मिलेगी। इससे युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
मेंडू बना रबड़ी-खोवा कारोबार का प्रमुख केंद्र
शहर के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्र में भी रबड़ी और खोवा का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है। विशेष रूप से कस्बा मेंडू इस कारोबार का अहम केंद्र है। यहां दुकानदार स्वयं भैंसों की खरीद कर गुणवत्तापूर्ण दूध की व्यवस्था करते हैं। वर्तमान में मेंडू से प्रतिदिन लगभग पांच क्विंटल रबड़ी और खोवा दिल्ली भेजा जाता है, जबकि हाथरस शहर से करीब दो क्विंटल रबड़ी प्रतिदिन अन्य शहरों को भेजी जाती है।
300 से 360 रुपये किलो तक दाम
जिले में रबड़ी के दाम 300 से 360 रुपये प्रति किलो तक हैं। शहरी क्षेत्र में खुदरा मूल्य लगभग 360 रुपये प्रति किलो है, जबकि ग्रामीण क्षेत्र से दिल्ली व अन्य शहरों को भेजी जाने वाली रबड़ी के थोक दाम गुणवत्ता के अनुसार 300 से 350 रुपये प्रति किलो तक हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी थे मुरीद
हाथरस की रबड़ी की प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इसके स्वाद के कायल थे। वर्ष 1994 में हास्य सम्राट काका हाथरसी के आमंत्रण पर हाथरस आगमन के दौरान उन्होंने यहां की रबड़ी का स्वाद लिया था और मंच से इसका उल्लेख भी किया था। काका हाथरसी पुरस्कार समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए अटलजी ने डॉ. राकेश शरद और भगवत शरण शर्मा को सम्मानित किया था। प्रवास के दौरान पूर्व पालिकाध्यक्ष रमेशचंद्र आर्य के आवास पर उन्हें हाथरस की रबड़ी विशेष रूप से पसंद आई थी।

















