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हाथरस 24 जनवरी । नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 127वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ सर्वप्रथम नेताजी के छायाचित्र पर अंगवस्त्र अर्पित कर एवं माल्यार्पण के साथ किया गया। इसके उपरांत उपस्थित जनों द्वारा दीप प्रज्वलित किया गया और “जय हिंद” के नारों के साथ कार्यक्रम आगे बढ़ा। कार्यक्रम में वक्ताओं ने नेताजी के जन्म, जीवन संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम में उनके अद्वितीय योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। हिंदुस्तान के महान सपूत एवं स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता सुभाष चंद्र बोस का जन्म उड़ीसा के कटक नगर में एक बंगाली परिवार में हुआ। उनके पिता जानकी नाथ बोस एक प्रसिद्ध वकील (राय बहादुर) थे, जबकि माता प्रभावती बोस धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. देवेंद्र कुमार शर्मा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नेताजी ने कटक से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की तथा कोलकाता के प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कॉलेज से अध्ययन किया। वर्ष 1920 में उन्होंने इंग्लैंड जाकर प्रतिष्ठित भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा उत्तीर्ण की, किंतु अंग्रेजी शासन की गुलामी स्वीकार न होने के कारण 1921 में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया और देश की आज़ादी के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। इसके पश्चात वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय रूप से जुड़े। पूर्व बेसिक शिक्षा अधिकारी भंवर सिंह पोरस ने बताया कि वर्ष 1938 में गुजरात के हरिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष निर्विरोध चुने गए। 1939 में उन्होंने महात्मा गांधी एवं कांग्रेस कार्यसमिति समर्थित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर पुनः अध्यक्ष पद प्राप्त किया, किंतु वैचारिक मतभेदों के चलते उन्होंने बाद में इस्तीफा दे दिया। डॉ. जितेंद्र स्वरूप शर्मा ‘फौजी’ ने भावुक होते हुए कहा कि वे स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं कि उनके पिता को नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा “फौजी” की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उन्होंने बताया कि बचपन में पिता का सान्निध्य न मिल पाने के बावजूद उनके परिवार में आज भी “फौजी” कहलाना गर्व का विषय है। कार्यक्रम में आज़ाद हिंद फौज से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों पर भी चर्चा की गई। वक्ताओं ने बताया कि 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी द्वारा आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना की गई, जिसे बाद में कई देशों ने मान्यता प्रदान की। नेताजी इस अस्थायी सरकार के प्रथम प्रधानमंत्री बने। लेफ्टिनेंट ए.सी. चटर्जी को वित्त मंत्री, ए.एस. अय्यर को प्रचार मंत्री तथा डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन (बाद में लक्ष्मी सहगल) को महिला मामलों की जिम्मेदारी सौंपी गई। रासबिहारी बोस इसके प्रमुख सलाहकार थे। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान के सामूहिक गायन के साथ समारोह का समापन किया गया।

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