
हाथरस 19 अक्टूबर। विजयदशमी के पर्व पर देशभर में बुराई के प्रतीक रावण के पुतले का दहन कर अच्छाई की बुराई पर विजय का संदेश दिया जाता है, लेकिन भारत की संस्कृति और सभ्यता ऐसी है, जहां किसी के नकारात्मक पक्ष के साथ उसके ज्ञान और विद्वता को भी सम्मान दिया जाता है। इसकी एक अनूठी मिसाल वर्ष 1974 में रावण पर जारी किया गया डाक टिकट है, जो हाथरस शहर के डाक टिकट संग्रहकर्ता शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ के संग्रह में आज भी सुरक्षित है। सदियों से रावण को बुराई और अधर्म का प्रतीक माना जाता रहा है, वहीं उसे प्रकांड विद्वान और ज्ञानी भी बताया गया है। इसी संदर्भ में भारत सरकार के डाक विभाग द्वारा रावण पर डाक टिकट जारी किया जाना विशेष महत्व रखता है।
शैलेंद्र वार्ष्णेय सर्राफ के संग्रह में मौजूद जानकारी के अनुसार, वर्ष 1974 में रावण के साथ सूर्य भगवान, चंद्र भगवान और भगवान नरसिंह पर भी डाक टिकट जारी किए गए थे। ये चारों डाक टिकट एक ही दिन जारी हुए थे। सूर्य भगवान के डाक टिकट की कीमत 20 पैसे, चंद्र भगवान के डाक टिकट की कीमत 50 पैसे और भगवान नरसिंह के डाक टिकट की कीमत एक रुपये थी। रावण पर जारी डाक टिकट भी इस संग्रह की विशेष पहचान है। इन डाक टिकटों से संबंधित लिफाफे को भी रावण की तस्वीर से सजाया गया था, जो इस ऐतिहासिक संग्रह को और खास बनाता है।
शैलेंद्र वार्ष्णेय का कहना है कि रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में देखना उसके व्यक्तित्व के एक ही पक्ष को सामने लाता है। रावण एक प्रकांड विद्वान था और धार्मिक मान्यताओं में उसके ज्ञान का भी उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम के हाथों मृत्यु प्राप्त कर रावण ने अपने साथ-साथ अपने परिजनों के उद्धार और मोक्ष का मार्ग प्राप्त किया। विजयदशमी का पर्व जहां हमें बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है, वहीं रावण पर जारी यह डाक टिकट भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को भी दर्शाता है, जिसमें किसी पात्र के दोषों के साथ उसके ज्ञान और अन्य विशेषताओं को भी समझने का प्रयास किया जाता है। हाथरस के संग्रहकर्ता के पास सुरक्षित यह डाक टिकट इतिहास, संस्कृति और डाक टिकट संग्रह की दृष्टि से एक अनूठी धरोहर है।










