हाथरस 18 जुलाई | दुख मन की अवस्था विशेष का नाम है। देह को कष्ट हो तो दर्द होता है, मन को कष्ट हो तो दुख। हो सकता है कि किसी को दर्द हो पर दुख न मानता हो, और ऐसा भी हो सकता है कि कोई दर्द न हो पर वह दुखी न हो। दुख का एकमात्र कारण है, अपना प्रेम संसार में लगा देना, और एकमात्र निवारण है वह प्रेम भगवान से लगा रखना।

विभीषण दुखी है, कहता है-

हनुमानजी! मैं इन राक्षसों के बीच ऐसे फंसा हूँ, जैसे दाँतों के बीच जीभ। जैसे दाँत जीभ को जबतब यहाँ वहाँ काटते रहते हैं, ये मुझे त्रस्त किए रहते हैं, मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता। अब हमारे भैया हनुमानजी तो हैं ही “नासै रोग मिटे सब पीरा” हनुमानजी कहते हैं चिंता मत करो, दो काम करो, एक तो वह स्थान दिखा दो जहाँ सीताजी बंदी हैं, माने यह बता दो कि तुम्हारा प्रेम संसार में कहाँ लगा है? दूसरे, तुम राम का नाम तो लेते हो, पर राम का काम नहीं करते। कौन सा काम? रावण आदि का विरोध करना, माने अपने अंत:करण के दोषों का शमन करना। तुम मूक दर्शक बने हो, अनाचार का विरोध नहीं करते। बस ये दो काम करो, दाँतों की चिंता मत करो।

राजेश्वरानंदजी कहते हैं, दाँत जीभ के बाद आते हैं, पर जाते पहले हैं। और जीभ बस जरा सा बोल जाए, दाँत टूटने में क्या देर लगती है? कुछ दिनों के बाद, सागर किनारे, दाँतों के विशेषज्ञ डा०रामचन्द्र का कैम्प लगेगा, बस तुम आ जाना, पर्ची मैं कटा रखूंगा। वे सारे दाँत निकाल देंगे, तब पूरे मुंह पर अकेली जीभ का ही राज होगा। माने लंका पर तुम्हारा राज होगा। आप भी हनुमानजी का यह मंत्र वैसे ही मान लो, जैसे विभीषण ने माना। विभीषण ने हनुमानजी को सीताजी का पता बता दिया और रावण का विरोध करने का संकल्प कर लिया।