फिर मन व्याकुल हुआ, शोक से करुणामय संसार हुआ।
औरैया की दुर्घटना से दिल को कष्ट अपार हुआ।।
एक साथ चौबीस मर गए, हैं छत्तीस श्रमिक गम्भीर।
देख देख दुर्दशा श्रमिक की नयन बहाने लगते नीर।।

कौन कहाँ का, नाम पता क्या, कुछ का ये भी नहीं पता।
घरवाले देखेंगे कब उनके आने का रस्ता।।
कितनी चीख मची होगी सोचो तो घटना स्थल पर।
निकली होगी जान किसी की जब ट्रक के नीचे दबकर।।

कोरोना के संकट की काली छाया इनके ऊपर।
परेशान होकर जीने को भाग रहे हैं इधर उधर।।
चिंतित हारे थके बेचारे पीड़ा में मजबूर हैं।
कौन समस्या समझे इनकी साधारण मजदूर हैं।।

मजदूरों की दीनदशा पर भाषणबाजी मत करना।
उनकी जगह स्वयं को रखकर ही अपना विचार रखना।।
हे ईश्वर! किन अपराधों की देता है तू सजा उन्हें।
जीवन देने के बजाय क्यों देता है तू कजा उन्हें।।

आओ शोक मनायें मृतकों को श्रद्धांजलि देकर के।
संवेदना और करुणा का भाव हृदय में लेकर के।।
जो घायल हैं वे बच जाये ऐसी हम प्रार्थना करें।
परिजन शोक हिमालय जैसा सह लें यह कामना करें।।

– अवशेष मानवतावादी