मेरे गाँव मरा है भूखा 
देखो राम दुलारा।

रोज सबरे तोड़ रहा है
सूखा का वो पत्थर।
कमजोरी है इतनी उस पर
सर खाता है चक्कर।
गिरवी रख कर खेत बैंक में 
ले आया है लोन।
इतना ब्याज चढ़ा सर पर है
मूल चुकाये कौन? 
फिर निष्ठुर हो गया विधाता
तीन बेटियाँ देदीं।
उनकी शादी की खातिर वो
फिरता मारा-मारा।
मेरे गाँव मरा है भूखा 
देखो राम दुलारा।

जब तक उसकी भरी जवानी
काम किया दिन-रात।
फुलिया कदम-कदम पर उसका
निभा रही थी साथ।
लेकर कर्जा रामदीन से
खाद बीज लाया था।
पैर दबाकर गिरधारी के
पानी भी पाया था।
विपदाओं की आँधी आई
उड़ा फूंस का छप्पर।
खड़ी फसल पर ओले आये 
टूट गया बेचारा।
मेरे गाँव मरा है भूखा 
देखो राम दुलारा।

बैलों के पीछे चल-चल के 
पाँव छाले फूटे।
किस्मत की बलिवेदी पर हैं
सारे रिस्ते रूँठे।
जिसने धरती चीर-चीर कर
खड़े कर दिये खेत।
आज उसी की लाश खा रही
भर-भर मुट्ठी रेत।
अब भी उसी पेड़ पर रस्सी
जिस पर देखा हलधर।
हमको जिसने दिये निवाले
वो हमसे ही हारा।
मेरे गाँव मरा है भूखा 
देखो राम दुलारा।