हाथरस 22 जुलाई | हरियाली तीज का त्यौहार उत्तर भारत में महिलाएं उत्साह और उमंग के साथ मनाती है। इस दिन वो सोलह श्रंगार करती है और घर-परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती है। शास्त्रोक्त मान्यता है कि इस तिथि को व्रत करने से पार्वती माता को महादेव वर के रूप में मिले थे। इसलिए इस तिथि का व्रत महिलाएं खासतौर पर करती है। इस दिन मेंहदी, झूले, सोलह श्रंगार, लहरिया और घेवर का काफी महत्व है।

महिलाएं करती है सोलह श्रंगार

हरियाली तीज भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आती है। इस दिन विवाहित महिलाओं के लिए वस्त्र और श्रंगार की सामग्री उनके मायके से आती है। इसको सिंगारा भी कहा जाता है। इस तरह सामग्री का आदान-प्रदान रिश्तों को प्रगाड़ करने के लिए भी किया जाता है। महिलाएं तीज से एक दिन पहले हाथों में मेंहदी रचा लेती है। तीज तिथि को सू्र्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर श्रंगार करती है और अपने मायके से आए हुए वस्त्रों को धारण करती है।

इसके बाद माता गौरी की पूजा करती है। एक पाट पर शिवजी-पार्वती के साथ गणेश जी की स्थापना करती है। देवी-देवताओं को कुमकुम, अक्षत, अबीर, गुलाल, वस्त्र आदी समर्पित करती है। भोग में आठ पूरी और आठ पूए समर्पित करती है। इसके साथ ही श्रंगार की सामग्री, वस्त्र, मिठाई आदि शगुन के सामान अपनी ससुराल पक्ष की महिलाओं को चरण स्पर्श कर भेंट करती है।

यह है पूजा विधि 

 

शिव पुराण के मुताबिक हरियाली तीज के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था इसलिए सुहागन स्त्रियों के लिए व्रत की बड़ी महिमा है | इस दिन महिलाएं महादेव और माता पार्वती की पूजा अर्चना करती हैं | हरियाली तीज की पूजा विधि इस प्रकार है |

महिलाएं इस दिन साफ-सफाई कर घर को सजाते हैं | एक चौकी पर मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, भगवान गणेश, माता पार्वती और उनकी सहेलियों की प्रतिमा बनायें | प्रतिमा बनाने के बाद देवताओं का आह्मान करते हुए षोडशोपचार पूजन करें | हरियाली तीज का व्रत का पूजन रातभर चलता है | इस दौरान महिलाएं जागरण और कीर्तन करती हैं |

हरियाली तीज है मेल मिलाप का पर्व

हरियाली तीज को झूला झूलना, तीज मिलन, गीत-संगीत और सामूहिक मेलजोल का भी का भी चलन है। हरियाली तीज को पति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन को आगे बढ़ाने का संकल्प भी लिया जाता है। इसके साथ ही इस दिन श्रंगार में चूड़ी, मेंहदी और लहरिया साड़ी पहनने का खास विधान है। यह भी मान्यता है कि इस दिन बेटी अपने मायके में आती है और ससुराल के सुख-दुख को अपने मायकेवालों और सखी-सहेलियों के साथ साझा करती है और उनका समाधान खोजती है।